अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और बढ़ती राजनीतिक सख्ती के खिलाफ शनिवार को दुनिया भर में भारी विरोध प्रदर्शन हुए। ‘नो किंग्स’ नाम के इस आंदोलन की शुरुआत अमेरिका से हुई और देखते ही देखते यह यूरोप और एशिया तक फैल गया। इस आंदोलन का नारा है — हम किसी राजा को नहीं मानते।
अमेरिका में ऐतिहासिक विरोध
अमेरिका में इस दिन करीब 2,600 से अधिक शहरों और कस्बों में प्रदर्शन हुए। न्यूयॉर्क, शिकागो, वॉशिंगटन डीसी, लॉस एंजेलिस और ह्यूस्टन समेत सभी बड़े शहरों में लाखों लोग सड़कों पर उतरे। आयोजकों के मुताबिक, करीब तीन मिलियन से अधिक लोगों ने इन रैलियों में हिस्सा लिया।
‘नो किंग्स’ संगठन ने अपने बयान में कहा, “हम ऐसे राष्ट्रपति को स्वीकार नहीं करते जो खुद को राजा समझते हों। अमेरिका में जनता की सत्ता सर्वोच्च है।” प्रदर्शनकारियों ने ट्रंप प्रशासन पर लोकतंत्र को कमजोर करने, प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करने और संविधान की भावना को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया।
लंदन और यूरोप में भी विरोध
लंदन में अमेरिकी दूतावास के बाहर हजारों लोगों ने ट्रंप प्रशासन की नीतियों के खिलाफ तख्तियां लेकर प्रदर्शन किया। यूरोप के अन्य शहरों — पेरिस, बर्लिन, मैड्रिड और बार्सिलोना में भी लोगों ने सड़कों पर उतरकर समर्थन जताया। कई जगह ‘Democracy is not a Monarchy’ और ‘No Kings, Only People Power’ जैसे बैनर देखे गए।
प्रमुख हस्तियों का समर्थन
इस आंदोलन को अमेरिका के प्रगतिशील नेताओं — बर्नी सैंडर्स, एलेक्ज़ेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज़ और हिलेरी क्लिंटन — का समर्थन मिला। कई फिल्मी सितारों और बुद्धिजीवियों ने सोशल मीडिया पर ‘#NoKings’ हैशटैग के साथ अभिव्यक्ति की आज़ादी और लोकतंत्र के पक्ष में संदेश साझा किए। अभिनेता रॉबर्ट डी नीरो ने अपने वीडियो संदेश में कहा, “यह आंदोलन सिर्फ ट्रंप के खिलाफ नहीं, बल्कि शक्ति के केंद्रीकरण के खिलाफ है।”
प्रशासन और रिपब्लिकन की प्रतिक्रिया
रिपब्लिकन नेताओं ने इन प्रदर्शनों को ‘एंटी-अमेरिकन कैंपेन’ बताया। टेक्सास और वर्जीनिया के गवर्नरों ने एहतियातन नेशनल गार्ड की तैनाती की। ट्रंप ने खुद इन विरोधों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “मैं राजा नहीं हूं। मुझे इस तरह पेश करना राजनीति से प्रेरित है और देश की छवि को नुकसान पहुंचाता है।”
शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बीच सुरक्षा इंतजाम
अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन (ACLU) ने करीब 10,000 प्रशिक्षित स्वयंसेवकों को तैनात किया, ताकि रैलियां शांतिपूर्ण बनी रहें। आयोजकों ने कहा कि यह आंदोलन लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा का वैश्विक प्रयास है — “किसी एक नेता को असीमित शक्ति देने का अर्थ है, जनता की आवाज़ को खामोश करना।”
विशेषज्ञों की राय
अमेरिकी समाजशास्त्रियों का कहना है कि ‘नो किंग्स’ अभियान सिर्फ एक राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि यह नागरिकों के अधिकारों और लोकतंत्र की रक्षा की नई लहर है। विशेषज्ञ डाना फिशर के अनुसार, “यह आंदोलन दिखा रहा है कि लोग अब सत्ता के केंद्रीकरण को स्वीकार नहीं करेंगे।”
‘नो किंग्स’ का यह नारा आज दुनिया भर में गूंज रहा है — “लोकतंत्र किसी का निजी साम्राज्य नहीं”। यह आंदोलन न केवल ट्रंप की नीतियों के खिलाफ, बल्कि इस संदेश के लिए भी खड़ा है कि जनता ही लोकतंत्र की असली ताकत है।
