अमेरिका की सैन्य कार्रवाई के बाद वेनेजुएला एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में है। इस कार्रवाई में वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी की गिरफ्तारी की खबरों ने दुनिया को चौंका दिया है। लेकिन इस राजनीतिक उथल-पुथल के बीच सोशल मीडिया और आर्थिक हलकों में एक सवाल सबसे ज्यादा घूम रहा है—दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार रखने वाला देश आखिर आर्थिक रूप से इतना कमजोर क्यों है?
वेनेजुएला के पास अरबों बैरल कच्चे तेल का भंडार है। इसके बावजूद वहां की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है और उसकी करेंसी दुनिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में गिनी जाती है। यही वजह है कि लोग इसकी तुलना भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था से कर रहे हैं, जहां संसाधन सीमित होने के बावजूद मुद्रा अपेक्षाकृत मजबूत है।
भारत और वेनेजुएला के रिश्ते लंबे समय से दोस्ताना रहे हैं। ऊर्जा क्षेत्र में दोनों देशों की साझेदारी मजबूत रही है। साल 2024 में भारत ने वेनेजुएला से करीब 22 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात किया था। अब अमेरिका के सीधे दखल के बाद इन रिश्तों पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। राजनीतिक अस्थिरता का सीधा असर व्यापार, निवेश और कूटनीति पर पड़ता है।
अगर करेंसी की बात करें तो वेनेजुएला की मुद्रा को बोलिवर (VES) कहा जाता है। मौजूदा दरों के हिसाब से 1 भारतीय रुपया करीब 3.34 बोलिवर के बराबर है। यानी भारत के 500 रुपये वेनेजुएला में करीब 1650 से 1690 बोलिवर की कीमत रखते हैं। कागज पर यह आंकड़ा बड़ा लगता है, लेकिन हकीकत में वहां की महंगाई इतनी ज्यादा है कि आम आदमी को इसका फायदा नहीं मिलता।
सवाल यह है कि तेल के बाद भी वेनेजुएला की करेंसी इतनी कमजोर क्यों हुई? इसकी बड़ी वजह है बेकाबू महंगाई, खराब आर्थिक नीतियां और लगातार राजनीतिक अस्थिरता। साल 2017 में वेनेजुएला ने खुद को आर्थिक रूप से दिवालिया घोषित कर दिया था। इसके बाद विदेशी निवेशकों ने मुंह मोड़ लिया। ऊपर से संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने हालात और बिगाड़ दिए। नतीजा यह हुआ कि तेल उत्पादन घटा और सरकार की कमाई का सबसे बड़ा जरिया कमजोर पड़ गया।
आज वेनेजुएला इस बात का उदाहरण है कि सिर्फ प्राकृतिक संसाधन किसी देश को अमीर नहीं बनाते, बल्कि स्थिर राजनीति और मजबूत आर्थिक प्रबंधन ही असली ताकत होते हैं।
