Home देश JLF 2025: सुधा मूर्ति और अक्षता मूर्ति का प्रेरणादायक संवाद

JLF 2025: सुधा मूर्ति और अक्षता मूर्ति का प्रेरणादायक संवाद

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जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक, उनकी पत्नी अक्षता मूर्ति, नारायण मूर्ति, सुधा मूर्ति और सुधा मूर्ति भी शामिल हुए। वहीं, राजस्थान के मुख्य सचिव सुधांश पंत भी दर्शकों के बीच बैठे नजर आए। जेएलएफ का आज तीसरा दिन है।

जेएलएफ में सुधा मूर्ति और अक्षता मूर्ति ने एक इंटरेस्टिंग सत्र के दौरान अपने बचपन और परवरिश के बारे में बातचीत की। वहीं, किताबों के महत्व के बारे में भी बात की।

अक्षता मूर्तिः “हमने सीखा कि अगर आप 20 की उम्र में आदर्शवादी नहीं हैं, तो आपके पास दिल नहीं है। और अगर आप 40 के बाद भी आदर्शवादी हैं, तो इसका मतलब है कि यू डोंट हैव अ ब्रेन। क्या आदर्शवादी होना सिर्फ बचपन तक सीमित है?”

सुधा मूर्तिः “मैं 74 साल की उम्र में भी आदर्शवादी हूं। मैंने बच्चों को सिखाया, आपको सबसे पहले एक अच्छा इंसान बनना है। दिल साफ रखना है। जैसा सोचो, वैसा ही बोलो, वैसा करो। ऐसा नहीं कि कुछ सोच रहे हो, कुछ कर रहे हो, और बोल कुछ और रहे हो। तभी आप अच्छी जिंदगी जी पाओगे।”

अक्षता मूर्तिः “अम्मा, मैं सब कुछ जानना चाहती हूं। यह रिश्ता मेरे लिए बेहद खास है, लेकिन हम घंटों बैठकर बात नहीं कर सकते। आज 45 मिनट मिले हैं, तो मुझे काफी फोकस रखना होगा। इसलिए मैं तुम्हारे सबसे पसंदीदा विषय, किताबों पर बात करना चाहती हूं। तुम किताबों को कैसे पढ़ती हो और उनसे कैसे सीखती हो?”

सुधा मूर्तिः “यह सत्र मां-बेटी का डिस्कशन क्लब नहीं होगा, इससे कहीं आगे की बातें होंगी। हम किताबों पर बात करेंगे, कैसे किताबें अज्ञान को दूर करती हैं और ज्ञान देती हैं। सभी माएं बेटी से प्यार करती हैं और सभी पिता बेटों से।”

अक्षता मूर्तिः “तुमने अपनी कहानियों के जरिए मुझे सारी नॉलेज दी। साइंस की, हिस्ट्री की, फिलॉसॉफी की, सबकी बातें बताई। लेकिन सबसे जरूरी बात जो तुमने सिखाई, वह यह कि स्कूल के लिए नहीं, बल्कि लाइफ के लिए पढ़ो। यह सोच कैसे आई?”

सुधा मूर्तिः “मैं शिक्षकों के परिवार से आई हूं। सिर्फ नारायण मूर्ति ऐसे थे जो व्यापार की तरफ चले गए। हर मौके पर किताबें दी जाती थीं। कहा जाता था कि ज्ञान सबसे महत्वपूर्ण है। मैं किताबों के साथ बड़ी हुई, पैसों के साथ नहीं। इसीलिए मैंने तुम्हें और रोहन को किताबें दीं और इसी के साथ बड़ा किया।”

अक्षता मूर्तिः “तुम्हारे पास लिटरेचर की किताबें थीं, पापा के पास साइंस और टेक्नोलॉजी की। हमने दोनों को मिलाकर अपनी लाइब्रेरी बनाई। मैं जानना चाहती हूं कि तुम्हारी इतनी किताबों में कौन सी ऐसी किताबें हैं जो तुम्हारे ‘लव फॉर लर्निंग’ की वैल्यू को प्रमोट करती हैं?”

सुधा मूर्तिः “‘हाउ आई टॉट माय ग्रैंड मदर’ यह मेरी एक ऐसी किताब है जो मुझे बेहद पसंद है। मेरी दादी 62 साल की थीं, मैं 12 साल की थी। वे कन्नड़ सीखना चाहती थीं। मैंने पूछा, इतनी उम्र में कैसे सीखोगी? उन्होंने कहा, सीखने की कोई उम्र नहीं होती। लेकिन जब मैंने अपनी दादी को सिखाया तो उन्होंने एक बार मेरे पांव छू लिए। उन्होंने कहा कि जिसने मुझे एक भी अक्षर सिखाया, वह गुरु है।”

अक्षता मूर्तिः “शेक्सपीयर की हैमलेट और एलिसन वे की ‘सिक्स ट्यूटर क्वीन’। क्योंकि इनमें रेजिलिएंस की स्टोरी है। क्रिएटिविटी और रेजिलिएंस एंड डिटरमिनेशन मिलता है। क्या आपको भी किसी किताब ने सिखाया?”

सुधा मूर्तिः “कई किताबों ने मुझे ऐसा सिखाया। जब मैं बच्ची थी, मेरे दादा मेरे हीरो थे, जब बड़ी हुई तो पिता हुए, फिर मुझे लगा कि आप अपने अनुभव से सीखते हो। ‘टेन थाउसेंड माइल्स विदाउट क्लाउड’ और ‘किंगडम ऑफ इंडस’ दो किताबें हैं, जिन्होंने मुझे काफी कुछ सिखाया।”

वहीं, आपको बताना चाहेंगे कि सुधा मूर्ति और अक्षता मूर्ति को सुनने के लिए भारी संख्या में भीड़ उमड़ी, जिसमें ग्रुप के लोग भी पहुंचे।

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