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EXCLUSIVE – भारत बनाम अमेरिका: दोनों देशों के लोगों के खर्च करने का तरीका कितना अलग? – जानिए

भारत

भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के लोगों की खर्च करने की आदतों को अक्सर एक सामान्य धारणा के माध्यम से समझाया जाता है—भारतीय बचत को प्राथमिकता देते हैं, जबकि अमेरिकी अधिक खर्च करते हैं। आधिकारिक आंकड़े इस धारणा का केवल एक हिस्सा सही बताते हैं। वास्तव में दोनों देशों में खर्च का स्वरूप आय, वस्तुओं और सेवाओं की कीमत, परिवार के आकार, आवास व्यवस्था, परिवहन, स्वास्थ्य प्रणाली और कर्ज की उपलब्धता से तय होता है। इसलिए केवल रुपये और डॉलर में कुल खर्च देखकर किसी देश के लोगों को अधिक खर्चीला कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

दोनों देशों के घरेलू बजट में सबसे बड़ा अंतर खर्च की प्राथमिकताओं में दिखाई देता है। भारत में भोजन का हिस्सा अब भी काफी बड़ा है, जबकि अमेरिका में आवास और परिवहन परिवार के बजट का आधे से अधिक हिस्सा ले लेते हैं। भुगतान के तरीकों में भी स्पष्ट अंतर है, क्योंकि भारत में UPI प्रमुख डिजिटल माध्यम बन चुका है और अमेरिका में खरीदारी के लिए क्रेडिट तथा डेबिट कार्ड का इस्तेमाल अधिक होता है। ये अंतर लोगों के स्वभाव से अधिक दोनों देशों की आर्थिक और वित्तीय संरचना को दर्शाते हैं।

प्रमुख आंकड़े एक नजर में

संकेतक भारत अमेरिका
आधिकारिक खर्च सर्वे HCES 2023-24 Consumer Expenditure Survey 2024
औसत खर्च ग्रामीण: ₹4,122 प्रति व्यक्ति प्रति माह; शहरी: ₹6,996 $78,535 प्रति कंज्यूमर यूनिट प्रति वर्ष
भोजन का हिस्सा ग्रामीण: लगभग 47%; शहरी: लगभग 40% 12.9%
सबसे महत्वपूर्ण गैर-खाद्य/मुख्य खर्च परिवहन प्रमुख गैर-खाद्य मद; शहरी किराया 6.58% आवास 33.4%; परिवहन 17%
डिजिटल भुगतान का प्रमुख रुझान FY 2025-26 में डिजिटल भुगतान संख्या में UPI का लगभग 85% हिस्सा 2024 में खरीद की संख्या का 40% क्रेडिट कार्ड और 33% डेबिट कार्ड से
उपलब्ध बचत संकेतक FY 2023-24 में घरेलू क्षेत्र की सकल बचत GDP की 18.1% जून 2026 में व्यक्तिगत बचत दर खर्च-योग्य आय की 2.7%

आंकड़ों को समझने की जरूरी शर्त: भारत और अमेरिका के खर्च संबंधी आंकड़े अलग इकाइयों में तैयार किए गए हैं। भारत का सर्वे प्रति व्यक्ति मासिक खर्च बताता है, जबकि अमेरिकी सर्वे एक कंज्यूमर यूनिट का वार्षिक खर्च मापता है। कंज्यूमर यूनिट एक परिवार, आर्थिक रूप से जुड़े लोगों के समूह या अकेले रहने वाले व्यक्ति को कहा जा सकता है। इसलिए ₹4,122 या ₹6,996 की सीधी तुलना $78,535 से करना सांख्यिकीय रूप से सही नहीं होगा।भारत: भोजन पर खर्च की हिस्सेदारी अब भी बड़ी

भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के Household Consumption Expenditure Survey 2023-24 के अनुसार, मुफ्त सरकारी वस्तुओं का अनुमानित मूल्य शामिल किए बिना ग्रामीण भारत में औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय ₹4,122 था। शहरी भारत में यही औसत ₹6,996 प्रति व्यक्ति प्रति माह दर्ज किया गया। सरकारी कल्याण योजनाओं के तहत मुफ्त मिली वस्तुओं का अनुमानित मूल्य जोड़ने पर ग्रामीण खर्च ₹4,247 और शहरी खर्च ₹7,078 हो जाता है। 2022-23 के मुकाबले नाममात्र औसत खर्च ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 9% और शहरी क्षेत्रों में लगभग 8% बढ़ा।

ग्रामीण भारत में भोजन कुल औसत उपभोग व्यय का लगभग 47% था, जबकि शहरी क्षेत्रों में इसकी हिस्सेदारी लगभग 40% रही। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय परिवार मात्रा के आधार पर अमेरिकी परिवारों से अधिक भोजन खरीदते हैं। यह प्रतिशत केवल बताता है कि भारतीय बजट का कितना हिस्सा भोजन पर खर्च होता है। आर्थिक रूप से कम आय वाले परिवारों के बजट में भोजन जैसी अनिवार्य जरूरतों की हिस्सेदारी सामान्यतः अधिक होती है और आय बढ़ने पर अन्य वस्तुओं तथा सेवाओं के लिए अधिक पैसा उपलब्ध होता है।

भारत के भोजन बजट में पेय पदार्थ, रिफ्रेशमेंट और प्रोसेस्ड फूड सबसे बड़ी उप-श्रेणी थी। कुल खर्च में इसका हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में 9.84% और शहरी क्षेत्रों में 11.09% दर्ज किया गया। दूध और दुग्ध उत्पादों का हिस्सा ग्रामीण भारत में 8.44% तथा शहरी भारत में 7.19% रहा। इसके मुकाबले अनाज और उसके विकल्पों की हिस्सेदारी ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 4.99% थी, जिससे भारतीय भोजन बजट में मौजूद विविधता दिखाई देती है।

गैर-खाद्य मदों में ग्रामीण भारत में परिवहन की हिस्सेदारी 7.59%, चिकित्सा की 6.83%, कपड़े-बिस्तर-जूते की 6.63% और टिकाऊ वस्तुओं की 6.48% थी। शहरी भारत में परिवहन 8.46% के साथ सबसे बड़ा गैर-खाद्य खर्च रहा। इसके बाद विविध वस्तुओं एवं मनोरंजन की हिस्सेदारी 6.92%, टिकाऊ वस्तुओं की 6.87% और किराए की 6.58% दर्ज की गई। इन आंकड़ों से पता चलता है कि भोजन महत्वपूर्ण बने रहने के बावजूद भारतीय परिवार परिवहन, स्वास्थ्य, घरेलू सामान और मनोरंजन पर भी बजट का उल्लेखनीय हिस्सा खर्च कर रहे हैं।

भारतीय उपभोग को केवल भोजन और अनिवार्य जरूरतों तक सीमित मानना इसलिए सही नहीं होगा। शहरी क्षेत्रों में कुल खर्च का लगभग 60% और ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 53% हिस्सा गैर-खाद्य वस्तुओं तथा सेवाओं पर जा रहा था। परिवहन, प्रोसेस्ड फूड और टिकाऊ वस्तुओं की हिस्सेदारी को अधिक विविध होते भारतीय उपभोक्ता बाजार के संकेत के रूप में पढ़ा जा सकता है। हालांकि राष्ट्रीय औसत अलग-अलग आय वर्गों, राज्यों और परिवारों के बीच मौजूद बड़े अंतर को पूरी तरह नहीं दिखाता।

अमेरिका: आवास और परिवहन पर आधे से अधिक बजट

अमेरिकी श्रम सांख्यिकी ब्यूरो के Consumer Expenditures 2024 के अनुसार, 2024 में एक अमेरिकी कंज्यूमर यूनिट का औसत वार्षिक खर्च $78,535 था। इसी अवधि में कर से पहले औसत वार्षिक आय $104,207 दर्ज की गई। औसत खर्च 2023 के $77,158 से 1.8% बढ़ा, जबकि कर-पूर्व औसत आय में 2.4% की वृद्धि हुई। ये राष्ट्रीय औसत हैं और किसी व्यक्तिगत अमेरिकी परिवार की वास्तविक आय या आर्थिक स्थिति का प्रतिनिधित्व आवश्यक रूप से नहीं करते।

अमेरिकी परिवारों के बजट में आवास सबसे बड़ा खर्च था। 2024 में आवास पर औसतन $26,266 खर्च हुए, जो कुल वार्षिक खर्च का 33.4% था। परिवहन पर औसत खर्च $13,318 या कुल बजट का 17% रहा। इस प्रकार आवास और परिवहन को मिलाकर अमेरिकी कंज्यूमर यूनिट के कुल खर्च का 50.4% हिस्सा बनता है।

अमेरिका में भोजन पर औसत वार्षिक खर्च $10,169 रहा, जो कुल बजट का 12.9% था। इसमें घर के लिए खरीदे गए भोजन पर $6,224 और घर से बाहर के भोजन पर $3,945 खर्च किए गए। स्वास्थ्य पर कुल खर्च का 7.9%, मनोरंजन पर 4.6%, कपड़ों एवं संबंधित सेवाओं पर 2.5% और शिक्षा पर 2% खर्च हुआ। व्यक्तिगत बीमा और पेंशन की हिस्सेदारी 12.5% थी, जिसमें सामाजिक सुरक्षा तथा रिटायरमेंट संबंधी योगदान भी शामिल हैं।

भारत के शहरी किराए के 6.58% और अमेरिका के आवास खर्च के 33.4% को सीधे आमने-सामने रखना उचित नहीं है। अमेरिकी सर्वे की आवास श्रेणी में किराए या स्वामित्व वाले मकान से जुड़े खर्च, उपयोगिताएं और दूसरी आवासीय मद शामिल हो सकती हैं। भारतीय HCES में किराया अपेक्षाकृत सीमित श्रेणी है और उसकी पद्धति अमेरिकी हाउसिंग श्रेणी से अलग है। फिर भी अमेरिकी आंकड़े इतना स्पष्ट करते हैं कि वहां घरेलू बजट पर आवास और परिवहन का संयुक्त दबाव बहुत बड़ा है।

भुगतान की आदत: भारत में UPI, अमेरिका में कार्ड

भारत में डिजिटल भुगतान का ढांचा तेजी से UPI-केंद्रित हुआ है। वित्त मंत्रालय की UPI के दस वर्षों पर जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, FY 2025-26 में UPI के माध्यम से 24,161.69 करोड़ लेनदेन किए गए। इन लेनदेन का कुल मूल्य लगभग ₹314 लाख करोड़ था और डिजिटल भुगतानों की संख्या में UPI का हिस्सा लगभग 85% बताया गया। मार्च 2026 तक 703 बैंक UPI नेटवर्क पर सक्रिय थे।

UPI का प्रत्येक लेनदेन उपभोक्ता खरीदारी नहीं होता, क्योंकि इसमें व्यक्ति से व्यक्ति धन हस्तांतरण भी शामिल है। इसलिए UPI की कुल संख्या को सीधे घरेलू उपभोग या रिटेल बिक्री नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद इसका विशाल पैमाना बताता है कि भारतीय उपभोक्ताओं ने छोटे और बार-बार होने वाले भुगतान के लिए बैंक खाते से तत्काल डिजिटल ट्रांसफर को बड़े स्तर पर अपना लिया है। इस व्यवस्था में भुगतान सामान्यतः उपयोगकर्ता के बैंक खाते से सीधे होता है और अलग से क्रेडिट लेना आवश्यक नहीं होता।

अमेरिका में खरीदारी के लिए कार्ड अधिक प्रभावशाली हैं। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ अटलांटा के 2024 Survey and Diary of Consumer Payment Choice के अनुसार, खरीद की संख्या में क्रेडिट कार्ड की हिस्सेदारी 40% थी। डेबिट कार्ड का हिस्सा 33% और नकद भुगतान का हिस्सा 17% दर्ज किया गया। खरीद के कुल डॉलर-मूल्य में 41% भुगतान क्रेडिट कार्ड और 25% डेबिट कार्ड से किया गया।

अमेरिका में क्रेडिट कार्ड केवल भुगतान का साधन नहीं, बल्कि रिवॉर्ड, क्रेडिट हिस्ट्री और अल्पकालिक उधारी से जुड़ा वित्तीय उत्पाद भी है। इसके बावजूद क्रेडिट कार्ड से की गई प्रत्येक खरीद को कर्ज पर किया गया खर्च नहीं माना जा सकता। कई कार्डधारक निर्धारित तारीख तक पूरा बिल चुका देते हैं और उन पर ब्याज नहीं लगता। उपलब्ध आंकड़े यह अवश्य दिखाते हैं कि अमेरिकी खुदरा भुगतान व्यवस्था कार्ड-केंद्रित है, जबकि भारत की तत्काल डिजिटल भुगतान व्यवस्था UPI और सीधे बैंक खाते पर अधिक आधारित है।

बचत: लोकप्रिय धारणा से अधिक जटिल तस्वीर

भारत की Economic Survey 2025-26 Statistical Appendix के अनुसार, FY 2023-24 में घरेलू क्षेत्र की सकल बचत GDP की 18.1% थी। यह अनुपात FY 2022-23 के 18.6% से थोड़ा कम था। घरेलू क्षेत्र की सकल बचत में केवल बैंक जमा या घर में रखी नकदी शामिल नहीं होती, बल्कि वित्तीय और भौतिक परिसंपत्तियां भी शामिल हो सकती हैं। इसमें घरेलू क्षेत्र के अंतर्गत गिने जाने वाले कुछ गैर-कॉरपोरेट व्यवसाय शामिल होने के कारण इसे वेतन में से बची व्यक्तिगत रकम नहीं समझना चाहिए।

अमेरिकी Bureau of Economic Analysis के अनुसार, जून 2026 में व्यक्तिगत बचत दर 2.7% थी। मई 2026 में यह दर 2.8%, अप्रैल में 3% और मार्च में 3.5% दर्ज की गई थी। अमेरिकी व्यक्तिगत बचत दर कर चुकाने के बाद उपलब्ध आय में से खर्च के बाद बची रकम का अनुपात बताती है। यह मासिक और संशोधन योग्य आंकड़ा है, इसलिए इसकी परिभाषा भारत की GDP-आधारित घरेलू क्षेत्र की सकल बचत से अलग है।

भारत की 18.1% घरेलू बचत और अमेरिका की 2.7% व्यक्तिगत बचत दर को सीधी तुलना के रूप में इस्तेमाल करना भ्रामक होगा। दोनों आंकड़ों के समय, आधार, दायरे और गणना की पद्धति अलग-अलग हैं। इनसे केवल इतना पता चलता है कि दोनों देशों में आधिकारिक संस्थाएं बचत को अलग आर्थिक मानकों के माध्यम से मापती हैं। भारतीयों को स्वभाव से अधिक बचत करने वाला सिद्ध करने के लिए इन दोनों प्रतिशतों का अकेले इस्तेमाल पर्याप्त नहीं है।

अमेरिका में घरेलू कर्ज की बड़ी भूमिका

न्यूयॉर्क फेड के 2026 की पहली तिमाही के Household Debt and Credit Report के अनुसार, अमेरिका का कुल घरेलू ऋण $18.8 ट्रिलियन था। इसमें मॉर्गेज बैलेंस $13.19 ट्रिलियन और क्रेडिट कार्ड बैलेंस $1.25 ट्रिलियन दर्ज किया गया। वाहन ऋण $1.69 ट्रिलियन और छात्र ऋण लगभग $1.66 ट्रिलियन था। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि अमेरिकी घरेलू ऋण का सबसे बड़ा हिस्सा रोजमर्रा की खरीदारी नहीं, बल्कि मकान से संबंधित मॉर्गेज में है।

अमेरिका में घरेलू कर्ज का बड़ा आकार उपभोग और संपत्ति खरीद दोनों में औपचारिक ऋण व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाता है। क्रेडिट कार्ड बैलेंस का $1.25 ट्रिलियन होना उपभोक्ता ऋण के बड़े पैमाने को अवश्य दर्शाता है, लेकिन इसे सभी अमेरिकियों पर समान रूप से बकाया कर्ज नहीं माना जा सकता। राष्ट्रीय कुल राशि में अलग-अलग आय, उम्र और क्रेडिट प्रोफाइल वाले करोड़ों उपभोक्ता शामिल हैं। कर्ज के आकार को समझते समय उसके प्रकार, ब्याज दर, भुगतान की स्थिति और परिवार की आय को भी देखना जरूरी है।

राष्ट्रीय औसत के भीतर बड़ी असमानताएं

भारत में 2023-24 का औसत शहरी मासिक प्रति व्यक्ति खर्च ग्रामीण औसत से लगभग 70% अधिक था। ग्रामीण उपभोग व्यय का गिनी गुणांक 0.237 और शहरी उपभोग व्यय का 0.284 दर्ज किया गया। अधिक गिनी गुणांक अपेक्षाकृत अधिक असमानता की ओर संकेत करता है, इसलिए शहरी क्षेत्रों में औसत खर्च अधिक होने के साथ उसका वितरण भी ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले अधिक असमान था। ये आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत औसत हर परिवार के जीवन स्तर को समान रूप से नहीं दर्शाता।

अमेरिका में भी आय वर्ग के अनुसार खर्च में बड़ा अंतर दर्ज किया गया। 2024 में सबसे निचले आय-पंचमांश की औसत वार्षिक खपत $35,046 थी, जबकि सबसे ऊंचे आय-पंचमांश में यह $150,342 रही। सबसे ऊंचे वर्ग का औसत खर्च सबसे निचले वर्ग के मुकाबले लगभग 4.3 गुना था। इसलिए “भारतीय उपभोक्ता” या “अमेरिकी उपभोक्ता” को एक समान समूह मानना दोनों ही देशों की आर्थिक विविधता को नजरअंदाज करना होगा।

कौन है अधिक खर्चीला?

उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर किसी एक देश के लोगों को स्वभाव से अधिक खर्चीला घोषित करना उचित नहीं है। भारत में भोजन और दूसरी आवश्यकताओं की हिस्सेदारी अधिक है, लेकिन गैर-खाद्य खर्च कुल बजट का आधे से अधिक हिस्सा बन चुका है। अमेरिका में भोजन का हिस्सा छोटा है, पर आवास और परिवहन मिलकर कुल खर्च के आधे से अधिक भाग पर कब्जा करते हैं। इससे पता चलता है कि दोनों देशों के परिवार खर्च तो करते हैं, लेकिन उनके बजट पर दबाव डालने वाली मदें अलग हैं।

भारत में UPI ने सीधे बैंक खाते से तत्काल भुगतान को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना दिया है। अमेरिका में क्रेडिट और डेबिट कार्ड खरीदारी के प्रमुख साधन हैं, जबकि मॉर्गेज, वाहन ऋण और छात्र ऋण घरेलू वित्त में बड़ी भूमिका निभाते हैं। बचत संबंधी उपलब्ध भारतीय और अमेरिकी प्रतिशत अलग पद्धतियों से तैयार किए गए हैं, इसलिए उनसे सरल राष्ट्रीय चरित्र बनाना तथ्यात्मक नहीं होगा। सही तुलना यह है कि भारत और अमेरिका में आय, कीमत, आवास, परिवहन और वित्तीय व्यवस्था ने उपभोग के दो अलग मॉडल तैयार किए हैं।

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