Home देश पंजाब पंजाब 2027: धर्म, किसान, नशा और सत्ता – किस मुद्दे पर होगा...

पंजाब 2027: धर्म, किसान, नशा और सत्ता – किस मुद्दे पर होगा चुनाव? – जानिए पूरी खबर

Photo Credits: Business Headline Hindi / Prayan Media Network / PMN News

कल्पना कीजिए कि 2024 के लोकसभा चुनाव में खालिस्तान समर्थक विचारधारा से जुड़े दो उम्मीदवार—अमृतपाल सिंह और सरबजीत सिंह खालसा—ने क्रमशः 38.62% और 29.5% वोट शेयर के साथ दो सीटें जीत लीं। इन दोनों उम्मीदवारों का प्रभाव पंजाब की 18 विधानसभा सीटों तक फैला हुआ माना जाता है।

इन नतीजों ने संकेत दिया कि अलगाववादी विचारधारा से जुड़े तत्व एक बार फिर राजनीतिक रूप से सक्रिय हो रहे हैं और 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव में वे मुख्यधारा की राजनीति का समीकरण बिगाड़ने वाले कारक (स्पॉइलर) बन सकते हैं। साथ ही, इन चुनाव परिणामों ने यह भी दिखाया कि इन समूहों ने धार्मिक पहचान, पंथिक नेतृत्व के अभाव (पंथिक वॉइड) और कृषि व धार्मिक संकट जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर एक वैकल्पिक राजनीतिक नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की।

धर्म परिवर्तन, धार्मिक पहचान और बेअदबी का मुद्दा

पंजाब की राजनीति में एक बार फिर धर्म और धार्मिक पहचान प्रमुख मुद्दे बनकर उभरे हैं। बेअदबी (धार्मिक ग्रंथों के अपमान) की घटनाएं और धर्म परिवर्तन के मामले कट्टरपंथी संगठनों, श्री अकाल तख्त और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की प्रमुख चिंताओं में शामिल हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार पंजाब में लगभग 3.5 लाख ईसाई हैं, जिनमें बड़ी संख्या दलित समुदाय से धर्म परिवर्तन करने वालों की है। हालांकि कुछ गैर-सरकारी आकलन यह संख्या राज्य की कुल आबादी के 10 से 15 प्रतिशत तक बताते हैं। इनका तर्क है कि धर्म परिवर्तन करने वाले कई दलित लोग सरकारी आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए दस्तावेजों में स्वयं को अब भी सिख या हिंदू दर्ज कराते हैं। चूंकि पंजाब की लगभग 32 प्रतिशत आबादी दलित समुदाय से आती है, इसलिए यह वर्ग राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

दूसरी ओर, बेअदबी के मामलों में न्याय न मिलने का मुद्दा भी लगातार राजनीतिक रंग ले रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2015 से 2026 के बीच पंजाब पुलिस ने बेअदबी से जुड़े 459 एफआईआर दर्ज किए। इनमें केवल 44 मामलों में दोषसिद्धि हो सकी, 83 मामलों को रद्द कर दिया गया, 99 मामलों में आरोपी बरी हो गए, 131 मामलों की जांच अब भी जारी है, जबकि 102 मामलों का अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है।

कट्टरपंथी संगठन इन्हीं लंबित मामलों को आधार बनाकर कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अन्य मुख्यधारा के दलों पर निशाना साधते हैं। उनका आरोप है कि किसी भी सरकार ने बेअदबी के मामलों में दोषियों को सजा दिलाने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए।

इसी बीच आम आदमी पार्टी सरकार ने ‘द जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026’ लागू कर समाधान निकालने की कोशिश की, लेकिन यह कदम उल्टा पड़ गया। श्री अकाल तख्त ने इस कानून पर आपत्ति जताई और सरकार की मंशा पर सवाल उठाए। वहीं शिरोमणि अकाली दल को भी 2015 के बेअदबी विरोधी प्रदर्शनों और बहबल कलां तथा कोटकपूरा पुलिस फायरिंग की घटनाओं को लेकर आज भी आलोचना का सामना करना पड़ता है। इन घटनाओं ने अकाली दल की सिख समाज में राजनीतिक पकड़ को गंभीर रूप से कमजोर किया और पंथिक नेतृत्व में एक बड़ा खालीपन पैदा हुआ।

इसी राजनीतिक और धार्मिक शून्य का लाभ उठाने की कोशिश कट्टरपंथी समूह कर रहे हैं। वे स्वयं को सिख धार्मिक पहचान के रक्षक के रूप में प्रस्तुत करते हैं और इसी आधार पर जनसमर्थन जुटाने का प्रयास करते हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो सामने आए हैं जिनमें कथित तौर पर तंबाकू बेचने या सेवन करने वाले लोगों के साथ मारपीट की घटनाएं दिखाई गईं। कुछ मामलों में निहंग समूहों द्वारा गैर-सिख धार्मिक आयोजनों में हस्तक्षेप करने और ईसाई प्रार्थना सभाओं पर हमले की घटनाएं भी सामने आई हैं। धर्म परिवर्तन का मुद्दा भी कट्टरपंथी संगठनों के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक एजेंडे में शामिल है। भाजपा नेताओं का दावा है कि उन्होंने सिख मूल के लगभग 8,500 लोगों को दोबारा सिख धर्म से जोड़ने का प्रयास किया है।

पंथिक नेतृत्व का अभाव और राजनीतिक खालीपन

2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों ने यह भी संकेत दिया कि शिरोमणि अकाली दल के कमजोर पड़ने से जो पंथिक नेतृत्व का खालीपन पैदा हुआ, उसे भरने की कोशिश कट्टरपंथी समूह कर रहे हैं। उनका प्रभाव केवल धार्मिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने किसानों की समस्याओं, नशे के बढ़ते संकट और ग्रामीण पंजाब की नाराजगी जैसे मुद्दों को भी अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया।

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत जेल में बंद अमृतपाल सिंह ने खडूर साहिब लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर 38.62 प्रतिशत वोट हासिल किए। इस लोकसभा क्षेत्र में जंडियाला, तरनतारन, खेमकरण, पट्टी, खडूर साहिब, बाबा बकाला, कपूरथला, सुल्तानपुर लोधी और जीरा सहित नौ विधानसभा क्षेत्र आते हैं।

इसी तरह, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारे बेअंत सिंह के पुत्र सरबजीत सिंह खालसा ने फरीदकोट लोकसभा सीट से 29.5 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। इस सीट के अंतर्गत निहाल सिंहवाला, बाघा पुराना, मोगा, धर्मकोट, गिद्दड़बाहा, फरीदकोट, कोटकपूरा, जैतो और रामपुरा फूल सहित नौ विधानसभा क्षेत्र आते हैं।

इस तरह दोनों नेताओं का प्रभाव कुल 18 विधानसभा क्षेत्रों तक माना जा रहा है। इसी दौरान अकाली दल के बागी विधायक मनप्रीत सिंह अयाली का वारिस पंजाब दे से जुड़ना भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना गया।

ग्रामीण पंजाब की बदलती राजनीति

पंजाब के कुल 2.14 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 1.36 करोड़ यानी करीब 63 प्रतिशत मतदाता ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। इसलिए राज्य की चुनावी राजनीति में ग्रामीण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में इस समय किसानों का आर्थिक संकट, नशे से हो रही मौतें, बेअदबी के लंबित मामले, धर्म परिवर्तन और धार्मिक पहचान की राजनीति प्रमुख चुनावी मुद्दे बन चुके हैं।

2022 के विधानसभा चुनाव में ग्रामीण क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी को लगभग 42 प्रतिशत वोट मिले थे। कांग्रेस को 22.98 प्रतिशत, शिरोमणि अकाली दल-बसपा गठबंधन को 18.4 प्रतिशत और भाजपा को लगभग 6.6 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे।

उधर, शिरोमणि अकाली दल का वोट प्रतिशत लगातार घटता गया। 2012 में जहां पार्टी को लगभग 37.6 प्रतिशत वोट मिले थे, वहीं 2017 में यह घटकर करीब 25 प्रतिशत और 2022 में 18.4 प्रतिशत तक पहुंच गया। 2022 में अकाली दल को केवल तीन सीटें मिलीं—माझा, मालवा और दोआबा क्षेत्र से एक-एक।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अकाली दल की इस गिरावट से पैदा हुए राजनीतिक खालीपन का लाभ कट्टरपंथी समूह उठाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका उद्देश्य मुख्यधारा के राजनीतिक विमर्श को धार्मिक और पंथिक मुद्दों की ओर मोड़कर ग्रामीण मतदाताओं को अपने पक्ष में आकर्षित करना है।

फ्लोटिंग वोट की अहम भूमिका

पंजाब की राजनीति में लगभग 15 से 20 प्रतिशत मतदाताओं को ‘फ्लोटिंग वोटर’ माना जाता है। ये ऐसे मतदाता हैं जो किसी एक दल के स्थायी समर्थक नहीं होते और चुनावी मुद्दों, उम्मीदवार की छवि तथा सरकार के प्रदर्शन के आधार पर अपना फैसला बदलते रहते हैं।

2022 के विधानसभा चुनाव में “बदलाव” के नारे के साथ आम आदमी पार्टी ने इसी फ्लोटिंग वोट का बड़ा हिस्सा अपने पक्ष में कर लिया। इसका सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल को उठाना पड़ा।

चंडीगढ़ स्थित इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन (IDC) तथा सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडीज़ इन सोशल साइंस एंड मैनेजमेंट (CASSM)के अध्यक्ष प्रोफेसर प्रमोद कुमार के अनुसार, यह वर्ग पारंपरिक राजनीतिक दलों से निराश रहता है और समय-समय पर किसी तीसरे विकल्प को मौका देने के पक्ष में रहता है। उनके अनुसार, यही मतदाता मुख्यधारा की पार्टियों पर लगातार बेहतर प्रदर्शन का दबाव बनाए रखते हैं और पंजाब की चुनावी दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

error: Content is protected !!
Exit mobile version