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राजस्थान निकाय चुनाव में कांग्रेस की बढ़त का दावा, RLP दूसरे और BJP तीसरे स्थान की जंग में? – जानिये पूरी खबर

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राजस्थान के 309 नगर निकायों के चुनाव में इस बार मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस तक सीमित नहीं दिख रहा है। स्थानीय मुद्दे, टिकट वितरण के बाद उभरे बागी, निर्दलीय उम्मीदवार और क्षेत्रीय दलों की सक्रियता ने चुनावी तस्वीर को बहुकोणीय बना दिया है। कांग्रेस खेमे का दावा है कि पार्टी निकाय चुनाव में सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरेगी, जबकि राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी यानी RLP कई इलाकों में दूसरे स्थान के लिए मजबूत दावेदारी पेश कर सकती है। भाजपा को कुछ क्षेत्रों में वोटों के बिखराव और अंदरूनी असंतोष की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

हालांकि चुनाव परिणाम आने से पहले किसी भी दल की जीत या अंतिम रैंकिंग को तय मानना जल्दबाजी होगी। निकाय चुनाव में मतदाता अक्सर राष्ट्रीय राजनीति से अधिक अपने वार्ड, मोहल्ले और शहर की समस्याओं को ध्यान में रखकर मतदान करता है। यही कारण है कि कई जगह बड़े दलों के बजाय स्थानीय रूप से सक्रिय उम्मीदवार भी निर्णायक साबित होते हैं।

स्थानीय मुद्दों पर कांग्रेस का फोकस

कांग्रेस निकाय चुनाव में सड़क, सफाई, पेयजल, सीवरेज, स्ट्रीट लाइट, अतिक्रमण, आवारा पशु, यातायात, पार्कों की स्थिति और स्थानीय रोजगार जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है। पार्टी का मानना है कि शहरी मतदाता अब केवल बड़े राजनीतिक नारों से प्रभावित नहीं होता, बल्कि वह अपने आसपास की बुनियादी सुविधाओं का हिसाब चाहता है।

निकाय चुनाव में प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि, लोगों से सीधा संपर्क, सामाजिक समीकरण और वार्ड की छोटी-छोटी समस्याओं को सुलझाने की क्षमता बहुत मायने रखती है। कांग्रेस इसी स्थानीय असंतोष और वार्ड स्तर के नेटवर्क को अपनी ताकत बताकर चुनाव मैदान में उतरी है। पार्टी कार्यकर्ताओं का दावा है कि कई शहरों में लोगों के बीच महंगाई, पानी की किल्लत, सफाई व्यवस्था और टूटी सड़कों को लेकर नाराजगी है, जिसका लाभ कांग्रेस को मिल सकता है।

कांग्रेस को कुछ सीटों पर निर्विरोध सफलता ने शुरुआती मनोवैज्ञानिक बढ़त भी दी है। पार्टी इसे स्थानीय संगठन की सक्रियता और प्रत्याशियों की स्वीकार्यता से जोड़कर देख रही है। हालांकि यह तस्वीर पूरे प्रदेश का रुझान नहीं बताती, लेकिन कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने में जरूर सहायक है।

RLP की चुनौती से बदले समीकरण

राजस्थान में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने निकाय चुनाव में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए कई वार्डों में उम्मीदवार उतारे हैं। RLP की राजनीतिक पकड़ खासकर उन क्षेत्रों में अधिक मानी जाती है, जहां किसान, जाट समाज और स्थानीय नेतृत्व से जुड़े मुद्दे प्रभाव रखते हैं। पार्टी का फोकस केवल वोट काटने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह कई जगह जीत दर्ज कर निकायों की राजनीति में अपनी स्वतंत्र भूमिका स्थापित करना चाहती है।

जोधपुर, नागौर, बाड़मेर, बीकानेर, जैसलमेर और पश्चिमी राजस्थान के कई इलाकों में RLP की सक्रियता ने मुकाबले को रोचक बना दिया है। पार्टी भाजपा और कांग्रेस से नाराज दावेदारों, स्थानीय प्रभावशाली चेहरों तथा संगठन से असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।

यदि RLP कुछ क्षेत्रों में मजबूत प्रदर्शन करती है, तो उसका असर सिर्फ उसकी जीती हुई सीटों तक सीमित नहीं रहेगा। त्रिकोणीय मुकाबलों में छोटे अंतर से होने वाली जीत-हार का फैसला क्षेत्रीय दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के वोट से हो सकता है। यही वजह है कि कई वार्डों में RLP को दूसरे स्थान की पार्टी के तौर पर देखा जा रहा है।

भाजपा के सामने संगठन और असंतोष की परीक्षा

सत्तारूढ़ भाजपा चुनाव में अपने बूथ नेटवर्क, संगठनात्मक ताकत और सरकार की योजनाओं के सहारे मजबूत प्रदर्शन का दावा कर रही है। पार्टी की कोशिश है कि शहरी विकास, सड़क, पेयजल, बिजली, स्वच्छता और केंद्र-राज्य सरकार की योजनाओं को मतदाताओं तक पहुंचाया जाए।

लेकिन टिकट वितरण के बाद कई क्षेत्रों में असंतोष और बागी उम्मीदवारों की मौजूदगी ने भाजपा की चुनौती बढ़ा दी है। जहां पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं या दावेदारों को टिकट नहीं मिला, वहां अधिकृत उम्मीदवारों के सामने भीतरघात या वोट कटने का खतरा हो सकता है। निकाय चुनाव में एक-एक वार्ड पर सीधा असर पड़ता है, क्योंकि यहां जीत का अंतर कई बार कुछ दर्जन या कुछ सौ वोटों तक सीमित रहता है।

भाजपा के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यह भी है कि सत्ता में होने के कारण स्थानीय जनता की अपेक्षाएं सरकार से अधिक रहती हैं। जिन क्षेत्रों में जलभराव, सफाई, सड़क, नालियों, ट्रैफिक या अतिक्रमण जैसे मुद्दे लंबे समय से बने हुए हैं, वहां विपक्ष इन्हें चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।

309 निकायों में असली मुकाबला

राजस्थान के 309 नगर निकायों में चुनावी घमासान है। नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिकाओं के हजारों वार्डों में मतदाता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे। महिला आरक्षण, युवा मतदाताओं की भागीदारी, जातीय-सामाजिक समीकरण और उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़ चुनावी परिणामों को प्रभावित करेगी।

कई वार्डों में भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला है, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे भी क्षेत्र हैं जहां RLP, बसपा, माकपा, बीएपी, आम आदमी पार्टी और निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव को बहुकोणीय बना रहे हैं। ऐसे में किसी एक दल की लहर की बजाय अलग-अलग शहरों और वार्डों में अलग परिणाम सामने आ सकते हैं।

कांग्रेस का दावा है कि वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी। RLP अपने प्रभाव वाले इलाकों में दूसरे स्थान और कई सीटों पर जीत की उम्मीद लगाए बैठी है। भाजपा का कहना है कि चुनाव परिणाम उसके पक्ष में आएंगे और पार्टी अपने संगठन के दम पर बढ़त बनाएगी।

फिलहाल चुनावी दावों और जमीनी आकलनों के बीच असली फैसला मतदाता के हाथ में है। नतीजे ही तय करेंगे कि राजस्थान की निकाय राजनीति में कांग्रेस वास्तव में नंबर एक बनती है या नहीं, RLP क्षेत्रीय विकल्प के रूप में कितनी मजबूत उभरती है और भाजपा अपनी शहरी राजनीतिक पकड़ को कितना बचा पाती है।

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