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EXCLUSIVE – रील्स की गिरफ्त में भारत की जनता: क्या हर दिन घंटों की स्क्रॉलिंग देश की सबसे बड़ी प्रतिभा को निगल रही है?

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भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यही युवा भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की सबसे बड़ी ताकत माने जाते हैं। लेकिन इसी युवा शक्ति के सामने एक ऐसी डिजिटल चुनौती तेजी से उभर रही है, जिस पर अभी तक गंभीर राष्ट्रीय बहस नहीं हो पाई है। यह चुनौती है सोशल मीडिया और विशेष रूप से शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म पर घंटों तक लगातार रील्स स्क्रॉल करने की आदत। विशेषज्ञ इसे केवल एक डिजिटल ट्रेंड नहीं, बल्कि समय, उत्पादकता और ध्यान (Attention Economy) का बड़ा संकट मान रहे हैं।

भारत का डिजिटल विस्तार अभूतपूर्व गति से बढ़ा है। Digital 2025 India रिपोर्ट के अनुसार देश में 80.6 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता और लगभग 49.1 करोड़ सक्रिय सोशल मीडिया यूजर हैं। वहीं नवीनतम उद्योग अनुमानों के अनुसार भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या अब एक अरब (1.02 बिलियन) के करीब पहुंच चुकी है और लगभग 75 करोड़ लोग स्मार्टफोन का उपयोग कर रहे हैं। यही वजह है कि भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे तेजी से बढ़ता डिजिटल बाजार बन चुका है।

लेकिन इस डिजिटल विस्तार के साथ स्क्रीन टाइम भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। उपलब्ध नवीनतम उद्योग आंकड़ों के अनुसार भारतीय उपयोगकर्ता औसतन प्रतिदिन लगभग 3.2 घंटे केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बिताते हैं। यदि इस औसत को पूरे वर्ष के आधार पर देखा जाए तो एक व्यक्ति लगभग 1,168 घंटे यानी करीब 46 दिन केवल सोशल मीडिया पर व्यतीत करता है। यह समय किसी डिग्री को पूरा करने, नई भाषा सीखने, एक पेशेवर कौशल विकसित करने या किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए पर्याप्त माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल औसत उपयोग है, जबकि कई युवा प्रतिदिन पांच से छह घंटे या उससे अधिक समय भी सोशल मीडिया पर बिताते हैं।

रील्स और शॉर्ट वीडियो इस बढ़ते स्क्रीन टाइम का सबसे बड़ा कारण बनकर सामने आए हैं। Meta द्वारा वर्ष 2026 में भारत में किए गए एक बड़े अध्ययन के अनुसार, देश के 97 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता प्रतिदिन वीडियो कंटेंट देखते हैं। अध्ययन में शामिल लगभग 89 प्रतिशत Gen Z उपयोगकर्ताओं ने स्वीकार किया कि वे नियमित रूप से Reels देखते हैं। ग्रामीण भारत में भी वीडियो उपभोग तेजी से बढ़ रहा है, जहां इंटरनेट की पहुंच बढ़ने के साथ शॉर्ट वीडियो सबसे लोकप्रिय डिजिटल माध्यम बन चुका है। इससे स्पष्ट होता है कि वीडियो आधारित कंटेंट अब भारत के डिजिटल व्यवहार का सबसे प्रमुख हिस्सा बन चुका है।

भारत के सोशल मीडिया इकोसिस्टम का आकार भी लगातार बढ़ रहा है। उद्योग के नवीनतम अनुमानों के अनुसार YouTube के भारत में लगभग 50 करोड़ उपयोगकर्ता हैं, जबकि Instagram करीब 48 करोड़ भारतीयों तक पहुंच चुका है। Facebook के उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग 40 करोड़ और Snapchat के उपयोगकर्ता 21 करोड़ के आसपास बताए जाते हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि भारत अब दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल उपभोक्ता बाजार बन चुका है, जहां करोड़ों लोग हर दिन कई घंटे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रहते हैं।

डिजिटल व्यवहार में आए इस बदलाव का एक बड़ा कारण भारत में सस्ते इंटरनेट की उपलब्धता भी है। दूरसंचार उद्योग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार भारत दुनिया के सबसे कम मोबाइल डेटा शुल्क वाले देशों में शामिल है। प्रति व्यक्ति मासिक मोबाइल डेटा खपत लगभग 24 जीबी तक पहुंच चुकी है, जो वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि सस्ते डेटा, तेज इंटरनेट और स्मार्टफोन की आसान उपलब्धता ने डिजिटल पहुंच को तो बढ़ाया है, लेकिन इसके साथ स्क्रीन टाइम भी लगातार बढ़ता गया है।

शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया का संतुलित उपयोग उपयोगी हो सकता है, लेकिन अत्यधिक उपयोग चिंता का विषय है। अंतरराष्ट्रीय शोधों में लंबे समय तक सोशल मीडिया उपयोग को ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, पढ़ाई और कार्यक्षमता में गिरावट, नींद की गुणवत्ता प्रभावित होने तथा मानसिक तनाव जैसी समस्याओं से जुड़ा पाया गया है। हालांकि शोधकर्ता यह भी स्पष्ट करते हैं कि इन प्रभावों की तीव्रता हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकती है और इसके लिए कई सामाजिक एवं व्यक्तिगत कारक भी जिम्मेदार होते हैं। इसलिए सोशल मीडिया को अकेला कारण मानना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि रील्स और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म इस प्रकार डिजाइन किए गए हैं कि उपयोगकर्ता अधिक समय तक ऐप पर बने रहें। एल्गोरिद्म लगातार उपयोगकर्ता की रुचि के अनुसार अगला वीडियो प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि कई लोग केवल कुछ मिनट के लिए ऐप खोलते हैं, लेकिन देखते-देखते एक या दो घंटे बीत जाते हैं। डिजिटल उद्योग में इसे “Attention Economy” कहा जाता है, जहां सबसे मूल्यवान संसाधन उपयोगकर्ता का समय और ध्यान होता है।

बच्चों और किशोरों में भी यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। हालिया सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि 14 से 16 वर्ष आयु वर्ग के अधिकांश बच्चों के पास स्मार्टफोन की पहुंच है और उनमें से बड़ी संख्या सोशल मीडिया का उपयोग मुख्य रूप से मनोरंजन के लिए करती है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि डिजिटल उपकरणों का उपयोग सीखने और कौशल विकास की बजाय केवल मनोरंजन तक सीमित रह जाए, तो इसका प्रभाव भविष्य की कार्यक्षमता पर पड़ सकता है।

भारत आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, रक्षा और स्टार्टअप इकोसिस्टम में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि सोशल मीडिया कितना लोकप्रिय हो चुका है, बल्कि यह है कि क्या देश की युवा आबादी अपना सबसे मूल्यवान संसाधन—अपना समय—उत्पादक कार्यों में निवेश कर रही है या अंतहीन स्क्रॉलिंग में गंवा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान सोशल मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाना नहीं है। आवश्यकता डिजिटल अनुशासन विकसित करने की है। यदि सोशल मीडिया का उपयोग शिक्षा, कौशल विकास, व्यवसाय, शोध और सार्थक संवाद के लिए किया जाए तो यह अवसर बन सकता है। लेकिन यदि प्रतिदिन कई घंटे बिना किसी उद्देश्य के केवल रील्स देखने में व्यतीत होने लगें, तो यह केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि देश की मानव पूंजी और उत्पादकता से जुड़ा एक गंभीर विषय बन जाता है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है और आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि यह पीढ़ी डिजिटल उपभोक्ता बनकर रह जाएगी या डिजिटल नवाचार की अगुआ बनेगी।

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