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क्या लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध भी अपराध है? सोनम वांगचुक के साथ हुई कार्रवाई कई गंभीर सवाल छोड़ जाती है

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भारत का लोकतंत्र हमेशा इस बात पर गर्व करता रहा है कि यहां असहमति को भी जगह मिलती है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने, शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने और सरकार से जवाब मांगने का अधिकार देता है। लेकिन हाल के दिनों में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के साथ हुई पुलिस कार्रवाई ने इस दावे पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।

सोनम वांगचुक कोई हिंसक आंदोलन का चेहरा नहीं हैं। वे लंबे समय से लद्दाख, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा और स्थानीय समुदायों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं। इस बार भी उनका आंदोलन छात्रों और लद्दाख से जुड़े जनहित के मुद्दों पर केंद्रित था। जब कोई व्यक्ति लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने के लिए भूख हड़ताल का रास्ता चुनता है, तब उसका जवाब संवाद से दिया जाना चाहिए, न कि बल प्रयोग से।

सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के दावों में आरोप लगाया गया कि दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को हटाने के दौरान उनके साथ अत्यंत कठोर व्यवहार किया। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि उन्हें पैरों से ठोकर मारते हुए हटाया गया। यदि ऐसे आरोप सही हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है जो नागरिकों के सम्मान और गरिमा की रक्षा का दावा करती है। इन आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आज भारत में शांतिपूर्ण विरोध करना भी कठिन होता जा रहा है? क्या सरकार की आलोचना करने वाला हर व्यक्ति प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करेगा? क्या लोकतंत्र में असहमति को दबाने की प्रवृत्ति मजबूत हो रही है? ऐसे प्रश्न इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि हाल के वर्षों में कई आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों पर प्रशासन की सख्ती चर्चा का विषय रही है।

कुछ आलोचक यहां तक पूछ रहे हैं कि क्या भारत की लोकतांत्रिक सरकार आलोचना के प्रति असहिष्णु होती जा रही है। यह चिंता लोकतांत्रिक मूल्यों के संदर्भ में उठाई जाती है। हालांकि, किसी भी सरकार की तुलना हिटलर जैसे तानाशाह से करना एक अत्यंत गंभीर और ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील दावा है, जिसके लिए ठोस ऐतिहासिक संदर्भ और प्रमाण आवश्यक होते हैं। लोकतंत्र में सरकारों की कड़ी आलोचना होना स्वाभाविक है, लेकिन ऐसी तुलना सावधानी और जिम्मेदारी के साथ ही की जानी चाहिए।

यह भी याद रखना होगा कि संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण एवं बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है। निश्चित रूप से इन अधिकारों पर कानून के तहत उचित और सीमित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन उन प्रतिबंधों का उद्देश्य नागरिकों की आवाज को दबाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना होना चाहिए। यदि किसी शांतिपूर्ण आंदोलन का उत्तर संवाद के बजाय बल प्रयोग से दिया जाता है, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है।

सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता स्थायी होनी चाहिए। किसी भी लोकतंत्र की असली ताकत इस बात में होती है कि वह अपने सबसे मुखर आलोचक की आवाज भी सुन सके। यदि सोनम वांगचुक जैसे शांतिपूर्ण आंदोलनकारी की मांगों का समाधान बातचीत से निकल सकता था, तो बल प्रयोग की आवश्यकता क्यों पड़ी? यही वह सवाल है जिसका जवाब केवल सरकार ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी देना होगा।

लोकतंत्र की पहचान सत्ता की ताकत से नहीं, बल्कि असहमति के प्रति उसके धैर्य से होती है। यदि शांतिपूर्ण विरोध को भी संदेह की नजर से देखा जाएगा, तो लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ—जनता का विश्वास—धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है।

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