Premium लेते वक्त बड़े वादे, क्लेम के वक्त दस्तावेजों का सवाल? Niva Bupa की कार्यप्रणाली पर उठते गंभीर सवाल

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स्वास्थ्य बीमा खरीदते समय ग्राहक की सबसे बड़ी उम्मीद यही होती है कि बीमारी या मेडिकल इमरजेंसी के मुश्किल वक्त में बीमा कंपनी उसका आर्थिक सहारा बनेगी। पॉलिसी बेचते समय कैशलेस इलाज, आसान क्लेम प्रक्रिया और समय पर सेटलमेंट जैसी सुविधाएं ग्राहकों के सामने प्रमुखता से रखी जाती हैं। लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब नियमित रूप से प्रीमियम चुकाने वाला पॉलिसीधारक वास्तव में क्लेम लेकर कंपनी के पास पहुंचता है और उसे बार-बार दस्तावेजों की मांग, आपत्तियों या अंततः क्लेम रिजेक्शन का सामना करना पड़ता है।

Niva Bupa Health Insurance को लेकर सामने आए कुछ मामलों और दस्तावेजों ने इसी मुद्दे पर सवाल खड़े किए हैं। शिकायत यह है कि पॉलिसी खरीदते समय प्रक्रिया जितनी आसान दिखाई जाती है, क्लेम के समय वही प्रक्रिया उपभोक्ता के लिए जटिल हो जाती है। कुछ मामलों में उपभोक्ताओं का आरोप है कि ऐसे दस्तावेज मांगे जाते हैं, जिनकी क्लेम के मूल तथ्यों से प्रासंगिकता पर ही सवाल उठता है। दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने को आधार बनाकर क्लेम अस्वीकार किए जाने के आरोप भी सामने आते हैं।

कंपनी के खर्च पर भी उठ चुके हैं नियामकीय सवाल

मामला केवल क्लेम प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। Niva Bupa के Expenses of Management यानी EoM के आंकड़े भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े करते हैं।

IRDAI के नियामकीय ढांचे में standalone health insurers के लिए प्रबंधन व्यय की मूल सीमा Gross Written Premium के 35 प्रतिशत से जुड़ी है। यानी सामान्य शब्दों में समझें तो कंपनी द्वारा जुटाए गए प्रत्येक ₹100 के प्रीमियम के मुकाबले प्रबंधन और कमीशन सहित संबंधित खर्चों के लिए नियामकीय सीमा तय है।

Niva Bupa के अपने FY2024-25 Annual Report के मुताबिक कंपनी का EoM ratio 37.41 प्रतिशत रहा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि कंपनी ने अपनी वित्तीय रिपोर्ट में स्वयं बताया कि FY2022-23 और FY2023-24 में allowable limit से अधिक EoM के संबंध में उसे forbearance approval मिला था।

FY2023-24 में कंपनी का EoM करीब 39.3 प्रतिशत बताया गया था, जो FY2024-25 में घटकर 37.4 प्रतिशत के आसपास आया। यानी सुधार के बावजूद यह मूल 35 प्रतिशत सीमा से ऊपर था।

हालांकि यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि नियामकीय गणना में कुछ अतिरिक्त allowances और accounting methodologies लागू हो सकती हैं, इसलिए प्रत्येक वर्ष के EoM को केवल 35 प्रतिशत से तुलना करके स्वतः नियामकीय उल्लंघन घोषित करना उचित नहीं होगा।

IRDAI ने लगाया छह महीने का प्रतिबंध

मामला अगस्त 2026 में और गंभीर हो गया। IRDAI ने Niva Bupa को छह महीने तक नया place of business खोलने से रोकने का निर्देश दिया। यह कार्रवाई FY2024-25 के Expenses of Management से जुड़े मामले के बाद सामने आई।

हालांकि कंपनी का कहना है कि उसकी स्थिति बाद में सुधरी और वह 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष तथा जून 2026 तिमाही में EoM Regulations के अनुरूप रही। इसलिए यह भी महत्वपूर्ण है कि कंपनी के वर्तमान अनुपालन और पूर्व वर्षों से जुड़े नियामकीय मुद्दों को अलग-अलग संदर्भ में देखा जाए।

क्लेम सेटलमेंट के आंकड़े कुछ और तस्वीर भी दिखाते हैं

दूसरी ओर, Niva Bupa का आधिकारिक पक्ष भी दर्ज किया जाना जरूरी है। कंपनी की FY2024-25 Annual Report के मुताबिक उसने वर्ष के दौरान 10.28 लाख से अधिक क्लेम प्राप्त किए और उसका reported claim settlement ratio 92.4 प्रतिशत रहा।

यानी उपलब्ध आधिकारिक आंकड़े यह नहीं कहते कि कंपनी अधिकांश क्लेम अस्वीकार करती है। लेकिन बड़ा सवाल केवल overall settlement percentage का नहीं है। सवाल यह भी है कि जो क्लेम अस्वीकार होते हैं, क्या प्रत्येक rejection का आधार वास्तव में उचित, आनुपातिक और पॉलिसी की शर्तों के अनुरूप है?

किसी कंपनी का overall settlement ratio अच्छा होना उस व्यक्तिगत ग्राहक की परेशानी को समाप्त नहीं करता, जिसका लाखों रुपये का वैध क्लेम किसी कथित रूप से मामूली या अप्रासंगिक दस्तावेज के कारण अटक जाए।

प्रीमियम लेते समय भरोसा, तो क्लेम के समय इतनी जटिलता क्यों?

यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।

अगर ग्राहक वर्षों तक समय पर प्रीमियम देता है, तो मेडिकल इमरजेंसी आने पर उससे केवल वही दस्तावेज मांगे जाने चाहिए जो क्लेम की पात्रता और वास्तविकता तय करने के लिए आवश्यक हों। किसी अतिरिक्त दस्तावेज की अनुपलब्धता को सीधे rejection का आधार बनाने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि उस दस्तावेज का क्लेम के निर्णय पर वास्तविक प्रभाव क्या है।

इस रिपोर्ट के साथ कुछ ऐसे दस्तावेज और प्रमाण भी संलग्न किए गए हैं, जिनके आधार पर संबंधित क्लेम प्रक्रिया और मांगे गए दस्तावेजों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इन मामलों में अंतिम निष्कर्ष संबंधित रिकॉर्ड, पॉलिसी की शर्तों और कंपनी के विस्तृत जवाब के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

स्वास्थ्य बीमा केवल एक वित्तीय उत्पाद नहीं, बल्कि मुश्किल समय में उपभोक्ता को दिया गया भरोसा है। इसलिए सवाल सीधा है—अगर प्रीमियम लेते समय ग्राहक पर भरोसा किया जाता है, तो क्लेम देने के समय प्रक्रिया इतनी कठिन क्यों हो जाती है?

Niva Bupa को इन सवालों का पारदर्शी जवाब देना चाहिए। क्योंकि बीमा उद्योग में असली भरोसा विज्ञापनों और वादों से नहीं, बल्कि उस दिन तय होता है जब पॉलिसीधारक अस्पताल के बिल के साथ कंपनी के दरवाजे पर खड़ा होता है।

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