राजस्थान के चित्तौड़गढ़ स्थित मेवाड़ के प्रसिद्ध कृष्णधाम श्री सांवलिया सेठ मंदिर का मासिक भंडार खुलते ही पहले दिन 10 करोड़ 11 लाख 83 हजार रुपये की नकद दानराशि सामने आई। अभी यह केवल शुरुआती आंकड़ा है, क्योंकि सोने-चांदी के आभूषण, विदेशी मुद्रा और अन्य दान की गिनती बाकी है। हर महीने करोड़ों रुपये का चढ़ावा मिलने वाला यह मंदिर देश के सबसे समृद्ध धार्मिक स्थलों में गिना जाता है।
इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी सामने आता है—क्या सांवलिया सेठ मंदिर में भी दान प्रबंधन और पारदर्शिता का वही मॉडल अपनाया जाएगा, जैसा अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में लागू किया गया है?
अयोध्या राम मंदिर में श्रद्धालुओं से मिलने वाले चढ़ावे की गिनती निर्धारित प्रक्रिया के तहत बैंक प्रतिनिधियों, अधिकृत कर्मचारियों और सीसीटीवी निगरानी में की जाती है। दानराशि को बैंकिंग सिस्टम में जमा किया जाता है और ट्रस्ट की ओर से वित्तीय प्रबंधन के लिए तय प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है।
सांवलिया सेठ मंदिर में भी हर महीने करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है। मंदिर प्रशासन की ओर से 150 से अधिक कर्मचारियों की मदद से नोटों की गिनती की जा रही है, जबकि सोने-चांदी और अन्य मूल्यवान वस्तुओं का मूल्यांकन अलग चरणों में किया जाता है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े धार्मिक संस्थानों में डिजिटल रिकॉर्ड, सीसीटीवी निगरानी, नियमित ऑडिट और समय-समय पर सार्वजनिक वित्तीय जानकारी जैसी व्यवस्थाएं श्रद्धालुओं का भरोसा और मजबूत कर सकती हैं।
यह सवाल किसी अनियमितता का आरोप नहीं है, बल्कि पारदर्शिता और आधुनिक वित्तीय प्रबंधन से जुड़ा है। जब देश के प्रमुख मंदिरों में हर महीने करोड़ों रुपये का चढ़ावा आ रहा है, तब यह चर्चा स्वाभाविक है कि क्या सभी बड़े धार्मिक संस्थानों में एक समान और अधिक पारदर्शी व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।
सांवलिया सेठ मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में यदि दान प्रबंधन की प्रक्रिया और अधिक आधुनिक, डिजिटल और सार्वजनिक रूप से पारदर्शी होती है, तो इससे श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत हो सकता है। फिलहाल मंदिर प्रशासन निर्धारित प्रक्रिया के तहत भंडार की गिनती कर रहा है और अंतिम आंकड़ा आने के बाद कुल चढ़ावे की जानकारी सार्वजनिक की जाएगी.
