EXCLUSIVE: दरी बिछाए कार्यकर्ता, मलाई काटे कुनबा: राजस्थान भाजपा में 25 वर्षों के परिवारवाद का कच्चा चिट्ठा

0
25

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलनों, चुनावी जनसभाओं और टेलीविज़न परिचर्चाओं में जिस एक विषय को सबसे अधिक मुखरता और सैद्धांतिक कठोरता के साथ उठाया जाता रहा है, वह है ‘परिवारवाद’। देश के शीर्ष नेतृत्व से लेकर मंडल स्तर के पदाधिकारियों तक, आम जनमानस और मतदाताओं को निरंतर यह विश्वास दिलाया जाता रहा है कि भाजपा अन्य दलों से भिन्न एक सुदृढ़ कैडर-आधारित, लोकतांत्रिक और आंतरिक अनुशासन से संचालित ‘कार्यकर्ताओं की पार्टी’ है। इस विमर्श का मूल आधार यह स्थापित करना रहा है कि यहां साधारण पृष्ठभूमि, बिना किसी राजनीतिक विरासत या रसूख वाला निष्ठावान कार्यकर्ता भी अपने कठिन परिश्रम, संगठन के प्रति समर्पण और पसीने के बल पर सर्वोच्च दायित्व तक पहुंच सकता है। इसके समानांतर, विपक्षी दलों—विशेषकर क्षेत्रीय और पुरानी राष्ट्रीय पार्टियों—पर यह निरंतर आक्षेप लगाया जाता रहा है कि वे वैचारिक दल न होकर पारिवारिक ट्रस्ट, निजी जागीरें या कॉरपोरेट ढर्रे पर संचालित प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां हैं। परंतु चुनावी राजनीति के व्यावहारिक धरातल पर जब टिकटों के आबंटन, सत्ता के विकेंद्रीकरण और संगठन के भीतर अवसर वितरण की बारी आती है, तो यह सैद्धांतिक प्रतिमान पूरी तरह खंडित नजर आता है। राजस्थान के संदर्भ में स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा के पारिवारिक दायरे को मिली व्यापक चुनावी स्वायत्तता ने यह स्पष्ट किया है कि परिवारवाद के विरोध का सिद्धांत व्यावहारिक राजनीति में अक्सर एक चयनात्मक और सुविधाजनक चुनावी विमर्श बनकर रह जाता है।

राजस्थान भाजपा: 25 वर्षों के परिवारवादी चेहरे (2001–2026)

पूरे नाम और ब्योरा देखने के लिए किसी भी पट्टी (हेडिंग) पर क्लिक करें

1. झाबर सिंह खर्रा कुनबा (श्रीमाधोपुर / सीकर — 1 घर से 4 दावेदार)
  • हरलाल सिंह खर्रा (पिता): राजस्थान भाजपा के कद्दावर नेता, 5 बार के विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री।
  • झाबर सिंह खर्रा (बेटा / स्वयं): पिता की विरासत पर लगातार टिकट, वर्तमान विधायक व भजनलाल सरकार में UDH कैबिनेट मंत्री।
  • शांति देवी (पत्नी): श्रीमाधोपुर पंचायत समिति के वार्ड संख्या 17 से भाजपा की आधिकारिक अधिकृत प्रत्याशी।
  • छोटा बेटा: पार्टी सिंबल पर पंचायत समिति चुनाव में उतारा गया।
  • दुर्गा सिंह खर्रा (बड़ा बेटा): टिकट न मिलने पर पार्टी से बागी होकर वार्ड 19 से निर्दलीय प्रत्याशी।
  • प्रतिभा सिंह खर्रा (भाई की पत्नी): छोटे भाई महावीर खर्रा की पत्नी, जिला परिषद वार्ड 23 से जिला प्रमुख पद की दावेदार।

2. शीर्ष दिग्गज घराने (राजे, शेखावत व जसोल परिवार)
  • वसुंधरा राजे ➔ दुष्यंत सिंह (बेटा): पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह झालावाड़-बारां लोकसभा सीट से लगातार 5 बार (2004, 2009, 2014, 2019, 2024) सांसद हैं।
  • भैरोंसिंह शेखावत ➔ नरपत सिंह राजवी (दामाद): पूर्व उपराष्ट्रपति के दामाद नरपत सिंह राजवी को भाजपा ने 5 विधानसभा चुनावों (2003, 2008, 2013, 2018, 2023) में टिकट दिया।
  • जसवंत सिंह जसोल ➔ मानवेंद्र सिंह (बेटा): पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह को बाड़मेर से सांसद (2004) व शिव से विधायक (2013) का टिकट मिला।
  • गुलाबचंद कटारिया ➔ अनीता कटारिया (पत्नी): पूर्व गृहमंत्री कटारिया की पत्नी को उदयपुर निकाय चुनावों में अवसर दिया गया।

3. मंत्रियों व विधायकों की संतानों को सीधी सियासी विरासत
  • नंदलाल मीणा ➔ हेमंत मीणा (बेटा): 7 बार के विधायक नंदलाल मीणा के बेटे हेमंत मीणा को प्रतापगढ़ से टिकट (2018 व 2023) मिला, वर्तमान में कैबिनेट मंत्री हैं।
  • सुंदरलाल काका ➔ कैलाश मेघवाल (बेटा): पूर्व मंत्री के बेटे कैलाश मेघवाल को पिलानी विधानसभा से 2018 व 2023 में भाजपा सिंबल दिया गया।
  • डॉ. दिगंबर सिंह ➔ डॉ. शैलेश सिंह (बेटा): पूर्व मंत्री के निधन के बाद बेटे डॉ. शैलेश सिंह को डीग-कुम्हेर विधानसभा से 2018 और 2023 में टिकट मिला।
  • किरोड़ी लाल मीणा ➔ गोलमा देवी (पत्नी): किरोड़ी लाल मीणा की पत्नी गोलमा देवी को महुवा और सपोटरा सीटों पर पार्टी व गठबंधन द्वारा टिकट मिला।
  • गुरजंट सिंह बराड़ ➔ बलवीर सिंह सोढ़ा (पोता): सादुलशहर सीट से पूर्व मंत्री के पोते बलवीर सोढ़ा को पार्टी सिंबल दिया गया।
  • मांगीलाल गर्ग ➔ तुलसीराम गर्ग (बेटा): मारवाड़ क्षेत्र से पूर्व विधायक के बेटे को टिकट में वरीयता मिली।

4. उपचुनावों में ‘सहानुभूति’ के नाम पर सीधे परिजनों को टिकट
  • सांवरलाल जाट ➔ रामस्वरूप लांबा (बेटा): सांसद के निधन पर बेटे को अजमेर लोकसभा उपचुनाव (2018) और फिर नसीराबाद विधानसभा से टिकट मिला।
  • किरण माहेश्वरी ➔ दीप्ति माहेश्वरी (बेटी): पूर्व कैबिनेट मंत्री के निधन पर राजसमंद उपचुनाव (2021) और 2023 में बेटी दीप्ति माहेश्वरी को टिकट मिला।
  • गौतमलाल मीणा ➔ कन्हैयालाल मीणा (बेटा): विधायक के निधन पर धरियावद उपचुनाव (2021) में सीधे बेटे को प्रत्याशी बनाया गया।
  • अमृतलाल मीणा ➔ शांता देवी मीणा (पत्नी): सलूंबर विधानसभा क्षेत्र में दिवंगत विधायक के स्थान पर पत्नी को टिकट मिला।

📌 डेटा स्रोत: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) व राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग के आधिकारिक दस्तावेज (2001–2026)।

श्रीमाधोपुर प्रकरण: पंचायती राज व्यवस्था में पारिवारिक प्रभाव का विस्तार

सीकर जिले के श्रीमाधोपुर विधानसभा क्षेत्र और जिला परिषद के स्थानीय निकाय चुनावों में जो परिदृश्य सामने आया, उसने संगठन के भीतर जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं के मनोबल पर गहरा प्रभाव डाला है। राज्य सरकार में नगरीय विकास एवं स्वायत्त शासन जैसे नीतिगत एवं प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विभाग का दायित्व संभाल रहे झाबर सिंह खर्रा स्वयं विधानसभा के निर्वाचित सदस्य हैं। इसके बावजूद, स्थानीय स्वशासन के प्राथमिक स्तर पर पारिवारिक प्रभाव को स्थापित करने की जो रूपरेखा बनी, उसने कई गंभीर राजनीतिक और नैतिक सवाल खड़े कर दिए। एक ही पारिवारिक इकाई के भीतर से स्थानीय निकायों के विभिन्न पदों के लिए बहुस्तरीय दावेदारी पेश की गई, जिससे चुनावी मुकाबला पार्टी बनाम विपक्ष के बजाय एक ही कुनबे के भीतर केंद्रित प्रतीत होने लगा।

इस चुनावी प्रक्रिया में मंत्री की पत्नी शांति देवी को श्रीमाधोपुर पंचायत समिति के वार्ड संख्या 17 से भारतीय जनता पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी घोषित करते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न प्रदान किया गया। इसके समानांतर, परिवार के दूसरे सदस्य के रूप में मंत्री के छोटे पुत्र को भी संगठन द्वारा आधिकारिक तौर पर अधिकृत प्रत्याशी बनाकर चुनावी समर में उतारा गया। राजनीतिक आकांक्षाओं का दायरा यहीं समाप्त नहीं हुआ; मंत्री के बड़े पुत्र दुर्गा सिंह खर्रा ने पंचायत समिति के वार्ड संख्या 19 से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अपना नामांकन दाखिल कर दिया। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए, मंत्री के अनुज महावीर खर्रा की पत्नी प्रतिभा सिंह ने जिला परिषद के वार्ड संख्या 23 से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी। इस प्रकार, दो प्रत्याशी दल के अधिकृत चुनाव चिह्न पर और दो प्रत्याशी बागी अथवा निर्दलीय स्वरूप में एक साथ मैदान में उपस्थित हुए। यह स्थिति सीधे तौर पर इस प्रश्न को जन्म देती है कि क्या दशकों से क्षेत्र में झंडा थामने वाले, रैलियों और धरना-प्रदर्शनों में अग्रिम पंक्ति में खड़े रहने वाले और संगठन की बुनियादी संरचना को जीवित रखने वाले निष्ठावान स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपस्थिति पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी।

नेतृत्व का दोहरा विमर्श: तर्कों की विसंगति और रणनीतिक मौन

इस संपूर्ण घटनाक्रम पर संगठन के प्रांतीय नेतृत्व का दृष्टिकोण और उस पर दी गई दलीलें राजनीतिक विश्लेषण के दृष्टिकोण से अत्यंत विचारणीय हैं। जब इस विषय पर प्रदेश संगठन के शीर्ष पदाधिकारियों से सवाल किए गए कि एक ही परिवार के भीतर इस प्रकार अवसरों का केंद्रीकरण क्यों हुआ और अनुशासन के विपरीत निर्दलीय ताल ठोकने वाले प्रत्याशी पर संगठन की क्या नीति रहेगी, तो इसके बचाव में यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव लड़ना प्रत्येक नागरिक का वैधानिक और मौलिक अधिकार है।

यह दलील राजनीतिक विमर्श के उस स्थापित ढांचे से सर्वथा भिन्न है जो पार्टी सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुत करती रही है। जब यही आचरण विपक्षी दलों द्वारा दोहराया जाता है, तो उसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं का हनन और वंशवादी व्यवस्था का परिचायक घोषित किया जाता है। यदि अपनी संतानों या निकट संबंधियों को सार्वजनिक जीवन में स्थापित करना केवल एक नागरिक अधिकार है, तो फिर चुनावी रैलियों में इसे लोकतंत्र के लिए गंभीर संकट के रूप में क्यों प्रस्तुत किया जाता है? यह विरोधाभास दर्शाता है कि सिद्धांतों की व्याख्या परिस्थितियों और सत्ता के समीकरणों के अनुरूप परिवर्तित हो जाती है। वहीं दूसरी ओर, सदन से लेकर सड़क तक संसदीय मर्यादाओं, संगठनात्मक अनुशासन और राजनीतिक शुचिता पर निरंतर प्रहार करने वाले वरिष्ठ नेता इस पूरे मामले पर पूर्ण रूप से मौन साधे रहे। विपक्ष के आंतरिक मतभेदों पर तत्काल संवाददाता सम्मेलन आयोजित करने वाले रणनीतिकारों का यह सन्नाटा यह संदेश देता है कि संगठनात्मक अनुशासन का कठोर दायरा प्रायः साधारण कार्यकर्ताओं तक सीमित रहता है, जबकि सत्ता और रसूख के समीकरणों के समक्ष नियम शिथिल पड़ जाते हैं।

ढाई दशकों की राजनीतिक निरंतरता: राजस्थान में स्थापित सियासी घराने

श्रीमाधोपुर का घटनाक्रम कोई एकाकी या अप्रत्याशित घटना नहीं है, बल्कि यह राजस्थान के चुनावी इतिहास में लंबे समय से चली आ रही एक सुदृढ़ व्यवस्था का विस्तार मात्र है। स्वयं झाबर सिंह खर्रा की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी विरासत की राजनीति से अछूती नहीं है; वे पूर्व मंत्री एवं पांच बार के विधायक रहे हरलाल सिंह खर्रा के पुत्र हैं। यदि वर्ष 2001 से 2026 तक के पिछले ढाई दशकों के चुनावी परिदृश्यों का गहन अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न अंचलों में कद्दावर नेताओं के पारिवारिक सदस्यों को निरंतर प्राथमिकता दी जाती रही है।

पूर्व उपराष्ट्रपति एवं राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रहे भैरोंसिंह शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी को जयपुर के महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्रों जैसे विद्याधर नगर और हवामहल से लगातार कई चुनावों में पार्टी का प्रत्याशी बनाया गया। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह झालावाड़-बारां लोकसभा क्षेत्र से निरंतर पांच बार संसद के निचले सदन के लिए निर्वाचित होते रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह जसोल के पुत्र मानवेंद्र सिंह बाड़मेर संसदीय क्षेत्र तथा शिव विधानसभा क्षेत्र से पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनावी राजनीति में सक्रिय रहे। पूर्व कैबिनेट मंत्री नंदलाल मीणा के पुत्र हेमंत मीणा ने प्रतापगढ़ विधानसभा क्षेत्र से अपनी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए वर्तमान मंत्रिमंडल में स्थान प्राप्त किया।

इसी प्रकार, पूर्व केंद्रीय मंत्री सांवरलाल जाट के पुत्र रामस्वरूप लांबा को पहले अजमेर संसदीय उपचुनाव और तत्पश्चात नसीराबाद विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया गया। पूर्व कैबिनेट मंत्री किरण माहेश्वरी की पुत्री दीप्ति माहेश्वरी ने राजसमंद क्षेत्र से चुनावी शुरुआत की। धरियावद क्षेत्र से पूर्व विधायक गौतमलाल मीणा के निधन के उपरांत उनके पुत्र कन्हैयालाल मीणा को प्रत्याशी बनाया गया। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित पिलानी विधानसभा क्षेत्र से पूर्व मंत्री सुंदरलाल काका के पुत्र कैलाश मेघवाल को लगातार अवसर दिए गए। पूर्वी राजस्थान के कद्दावर नेता रहे डॉ. दिगंबर सिंह के पुत्र डॉ. शैलेश सिंह डीग-कुम्हेर क्षेत्र से चुनावी समर में उतारे गए। वरिष्ठ नेता एवं कैबिनेट मंत्री किरोड़ी लाल मीणा की पत्नी गोलमा देवी महुवा और सपोटरा जैसे क्षेत्रों से प्रत्याशी बनीं, जबकि पश्चिमी राजस्थान में पूर्व मंत्री गुरजंट सिंह बराड़ के पोते बलवीर सिंह सोढ़ा को सादुलशहर से अवसर दिया गया। यह विस्तृत सूची यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि राज्य की राजनीति में स्थापित घरानों का प्रभाव किसी एक दल या कालखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन के निर्णय प्रायः इन घरानों के प्रभाव के इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं।

सहानुभूति का चुनावी दोहन और संगठनात्मक उत्तराधिकार

राजस्थान की राजनीति में एक और स्थापित परंपरा उपचुनावों के दौरान देखने को मिलती रही है। जब भी किसी पदासीन सांसद या विधायक का आकस्मिक निधन हुआ, तो संगठन ने उस निर्वाचन क्षेत्र में दशकों से कार्य कर रहे किसी वरिष्ठ, अनुभवी और संघर्षशील कार्यकर्ता को अवसर प्रदान करने के स्थान पर परिवार के प्रति सहानुभूति की लहर को भुनाने की रणनीति अपनाई।

अजमेर लोकसभा उपचुनाव, राजसमंद विधानसभा उपचुनाव और धरियावद विधानसभा उपचुनाव के निर्णय इसी राजनीतिक रणनीति के परिचायक हैं। इन सभी मामलों में संगठन ने कैडर की प्राथमिकताओं को गौण करते हुए संबंधित नेता के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी को ही चुनाव मैदान में उतारना सबसे सुरक्षित राजनीतिक कदम माना। इस कार्यशैली ने कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा पुष्ट की कि किसी क्षेत्र विशेष की राजनीतिक प्रतिनिधित्व क्षमता वास्तव में संगठन की सामूहिक शक्ति नहीं, बल्कि एक विशिष्ट परिवार की स्थायी धरोहर मानी जाने लगी है। इससे नए और संसाधनविहीन कार्यकर्ताओं के लिए नेतृत्व की पहली पंक्ति में पहुंचने के अवसर स्वतः ही सीमित हो जाते हैं।

पंचायती राज में महिला प्रतिनिधित्व और पारिवारिक प्रभाव

स्थानीय स्वशासन, विशेषकर पंचायती राज एवं नगर निकायों में महिलाओं की सक्रिय और स्वतंत्र राजनीतिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से पचास प्रतिशत आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था की गई थी। इस नीति का मूल ध्येय उन साधारण और वंचित पृष्ठभूमि की महिलाओं को नीति-निर्माण की प्रक्रियाओं से जोड़ना था जो पारंपरिक सामाजिक बंधनों के कारण आगे नहीं आ पाती थीं। परंतु व्यावहारिक धरातल पर इस प्रगतिशील व्यवस्था को अक्सर पारिवारिक राजनीतिक रसूख को अक्षुण्ण बनाए रखने के उपकरण के रूप में रूपांतरित कर दिया गया।

जब भी कोई पंचायत समिति प्रधान, जिला प्रमुख अथवा नगर परिषद सभापति का पद महिला वर्ग के लिए आरक्षित होता है, तो पार्टी संगठन की उन निष्ठावान महिला कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दिया जाता है जो वर्षों से महिला मोर्चा या जमीनी अभियानों में सक्रिय रहती हैं। उनके स्थान पर स्थानीय सांसदों, विधायकों अथवा प्रभावशाली नेताओं के परिवार की महिलाओं—पत्नी, पुत्रवधू या माता—को अधिकृत प्रत्याशी बना दिया जाता है। श्रीमाधोपुर और जिला परिषद के संदर्भ में शांति देवी और प्रतिभा सिंह की उम्मीदवारी इसी प्रवृत्ति का जीवंत उदाहरण है। ऐसी व्यवस्था में जमीनी स्तर पर कार्य करने वाली साधारण महिला कार्यकर्ताओं की भूमिका केवल रैलियों में संख्या बल प्रदर्शित करने, नारों का उद्घोष करने और वरिष्ठ नेताओं के स्वागत तक सीमित रह जाती है, जबकि वास्तविक नीतिगत सत्ता और प्रतिनिधित्व पुनः उन्हीं विशिष्ट घरानों के नियंत्रण में चला जाता है।

कैडर का आंतरिक संकट: निष्ठा बनाम अवसरवादिता

इस संपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था का सबसे गहरा और स्थायी दुष्प्रभाव उस साधारण कार्यकर्ता पर पड़ता है, जो किसी व्यक्तिगत लाभ की प्रत्याशा के बिना विशुद्ध वैचारिक निष्ठा के आधार पर संगठन से जुड़ा रहता है। वह कार्यकर्ता जो भीषण गर्मी, कड़ाके की ठंड और बरसात के थपेड़ों के बीच साइकिलों या पैदल चलकर पार्टी के झंडे लगाता है, दीवारों पर प्रचार लिखता है और घर-घर जाकर संगठन की नीतियों का प्रचार करता है, वह खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। वह कार्यकर्ता जो सोशल मीडिया और सार्वजनिक चौपालों पर अपने दल के ‘आंतरिक लोकतंत्र’ और ‘वंशवाद-मुक्त भारत’ के संकल्प का बचाव करने के लिए विरोधियों से तर्क-वितर्क करता है, जब अपनी ही आंखों के सामने स्थानीय निकाय जैसे बुनियादी चुनाव में भी केवल एक परिवार के प्रभुत्व को स्थापित होते देखता है, तो उसका वैचारिक विश्वास डगमगा जाता है।

जब वर्षों के समर्पण के पश्चात भी एक सामान्य नगर पालिका वार्ड या पंचायत समिति के टिकट के लिए किसी साधारण कार्यकर्ता की दावेदारी को अनदेखा कर उसे किसी प्रभावी नेता के परिजनों के पक्ष में प्रचार करने का आदेश दिया जाता है, तो यह केवल एक टिकट का बंटवारा नहीं होता, बल्कि आंतरिक लोकतंत्र की मूल अवधारणा पर प्रहार होता है। कार्यकर्ता की स्थिति एक सक्रिय और निर्णयकर्ता भागीदार से घटकर केवल ‘इलेक्शन मैनेजमेंट’ के औजार तक सीमित हो जाती है। यह विभाजन संगठन की उस मूल भावना को आघात पहुंचाता है, जिसमें योग्यता और त्याग को प्राथमिकता देने का दावा किया जाता था।

राजनीतिक शुचिता का यथार्थ और भविष्य का परिदृश्य

श्रीमाधोपुर का प्रकरण केवल एक जिले या एक मंत्री के परिवार का स्थानीय विवाद नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में कथनी और करनी के बीच बढ़ते हुए फासले का एक प्रामाणिक दस्तावेज है। यह घटनाक्रम यह स्पष्ट करता है कि राजनीतिक दल जब विपक्ष में होते हैं, तो उनके लिए परिवारवाद एक असहनीय लोकतांत्रिक दोष और वैचारिक अपराध होता है, किंतु सत्ता की बागडोर हाथ में आते ही वही व्यवस्था ‘विनेबिलिटी’ अर्थात जीत की अनिवार्यता और ‘नागरिक अधिकारों’ की आड़ में पूरी तरह स्वीकार्य बना ली जाती है।

यदि कोई संगठन वास्तव में कैडर-आधारित संरचना और योग्यता आधारित लोकतंत्र के सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखना चाहता है, तो उसे ऐसे मामलों में कड़े और अनुकरणीय निर्णय लेने होते हैं। सत्ताधारी प्रभाव के आगे संगठनात्मक मर्यादाओं का यह समर्पण यह सिद्ध करता है कि चुनावी लाभ और पारिवारिक हितों के टकराव में अंततः सत्ता की व्यावहारिक राजनीति ही प्रभावी होती है। जब तक राजनीतिक दल अपने स्थापित सिद्धांतों को बिना किसी अपवाद के अपने ही प्रभावशाली नेताओं पर लागू करने का साहस नहीं जुटाते, तब तक परिवारवाद के विरोध के तमाम दावे केवल विरोधी दलों पर प्रहार करने के सुविधाजनक और सामयिक औजार ही बने रहेंगे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here