भाजपा का दोहरा चरित्र: रिवारवाद के विरोध का ढोंग और कटघरे में पार्टी की रीति-नीति

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भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मंचों, प्रेस वार्ताओं और चुनावी सभाओं में एक शब्द सबसे ऊंचे सुर में गूंजता है—‘परिवारवाद’। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व देश के हर कोने में खड़े होकर विपक्षी दलों पर वंशवाद, भाई-भतीजावाद और परिवार को सत्ता की सीढ़ी बनाने का तीखा आरोप लगाता रहा है। जनता को दशकों से यह पाठ पढ़ाया गया कि भाजपा कार्यकर्ताओं की पार्टी है, जहां एक सामान्य व्यक्ति केवल अपनी निष्ठा और पसीने के दम पर आगे बढ़ सकता है। लेकिन जैसे ही चुनावी टिकटों के बंटवारे और सत्ता की मलाई बांटने की बारी आती है, भाजपा का यह तथाकथित आदर्शवादी नकाब पूरी तरह उतर जाता है। राजस्थान में स्वायत्त शासन (UDH) मंत्री झाबर सिंह खर्रा के परिवार को मिली खुली राजनीतिक छूट ने भाजपा के इस नैतिक पाखंड को सीधे जनता की अदालत के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।

जब मंत्री का घर बना ‘टिकट वितरण केंद्र’: खर्रा कुनबे की चुनावी दावेदारी

राजस्थान के स्थानीय निकाय और पंचायती राज चुनावों में जो तस्वीर सामने आई है, उसने भाजपा के सामान्य और समर्पित कार्यकर्ताओं के स्वाभिमान पर गहरा आघात किया है। भजनलाल सरकार में कद्दावर UDH मंत्री झाबर सिंह खर्रा स्वयं विधायक हैं और सरकार के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में से एक संभाल रहे हैं। लेकिन सत्ता की भूख केवल एक विधानसभा सीट या एक मंत्रालय तक सीमित नहीं रही। स्थानीय स्तर की पंचायती व्यवस्था—श्रीमाधोपुर पंचायत समिति से लेकर जिला परिषद तक—पर पूरे खर्रा कुनबे का राजनीतिक आधिपत्य जमाने की खुली तैयारी कर दी गई।

इस पारिवारिक सियासी खेल के आंकड़े किसी भी निष्पक्ष नागरिक को हैरान करने के लिए काफी हैं:

  1. मंत्री की पत्नी शांति देवी: भाजपा ने उन्हें श्रीमाधोपुर पंचायत समिति के वार्ड संख्या 17 से अपना आधिकारिक प्रत्याशी घोषित करते हुए पार्टी सिंबल थमा दिया।

  2. छोटा बेटा: परिवार के दूसरे सदस्य यानी मंत्री के छोटे बेटे को भी भाजपा ने पार्टी का टिकट देकर चुनावी समर में उतार दिया।

  3. बड़ा बेटा दुर्गा सिंह खर्रा: जब एक ही घर में दो आधिकारिक टिकट मिलने के बाद भी महत्वाकांक्षा शांत नहीं हुई, तो बड़े बेटे दुर्गा सिंह खर्रा ने पंचायत समिति के वार्ड 19 से निर्दलीय पर्चा दाखिल कर दिया।

  4. भाई की पत्नी प्रतिभा सिंह खर्रा: मंत्री के छोटे भाई महावीर खर्रा की पत्नी प्रतिभा सिंह ने जिला परिषद के वार्ड 23 से अपनी दावेदारी ठोक दी।

एक ही घर से चार-चार लोग चुनाव लड़ रहे हैं—दो भाजपा के आधिकारिक चुनाव चिन्ह पर और दो बागी या निर्दलीय बनकर। यह सीधे तौर पर सत्ता का पारिवारिक केंद्रीकरण नहीं तो और क्या है? क्या सीकर और श्रीमाधोपुर में भाजपा के पास वर्षों से झंडा ढोने वाले, दरियां बिछाने वाले और पार्टी के कार्यक्रमों में लाठियां खाने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं का अकाल पड़ चुका था? जब एक ही परिवार के आंगन में टिकटों की रेवड़ियां बांटी जा रही थीं, तब भाजपा का वह ‘कार्यकर्ता आधारित पार्टी’ वाला सिद्धांत किस कोने में छिपा बैठा था?

मदन राठौड़ और राजेंद्र राठौड़ की चुप्पी: कटघरे में भाजपा नेतृत्व

इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा के प्रांतीय नेतृत्व और उसके दिग्गज नेताओं का रवैया सबसे अधिक शर्मनाक और निंदनीय रहा है। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़, जो हर दिन माइक पर आकर कांग्रेस और अन्य दलों पर परिवारवाद के तीखे तीर चलाते हैं, इस मामले पर पूरी तरह बगलें झांकते नजर आए। जब उनसे मंत्री झाबर सिंह खर्रा के परिवार के चार-चार लोगों के चुनाव लड़ने पर तीखे सवाल पूछे गए, तो उन्होंने बड़ी बेशर्मी से यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि “चुनाव लड़ना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है”।

मदन राठौड़ और भाजपा की पूरी शीर्ष मंडली से यह सीधा सवाल पूछा जाना चाहिए:

  • जब विपक्षी दल का कोई नेता अपने बेटे, बेटी, पत्नी या भाई को टिकट देता है, तो क्या वह उनका ‘मौलिक अधिकार’ नहीं होता?

  • तब वह भाजपा के भाषणों में ‘लोकतंत्र का हनन’, ‘वंशवाद का पाप’ और ‘देश के लिए दीमक’ कैसे बन जाता है?

  • क्या ‘मौलिक अधिकार’ की यह सुविधाजनक परिभाषा केवल भाजपा के मंत्रियों और उनके रिश्तेदारों के लिए ही लागू होती है?

वहीं दूसरी ओर, भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़, जो बात-बात पर नैतिकता, शुचिता और पार्टी अनुशासन का पाठ पढ़ाते नहीं थकते, आज इस खुले परिवारवाद पर पूरी तरह चुप्पी साधे बैठे हैं। वे नेता जो विपक्ष के मामूली अंदरूनी मामलों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मर्यादा की दुहाई देते थे, आज अपनी ही पार्टी के मंत्री द्वारा सत्ता की इस नंगी कुनबापरस्ती पर एक शब्द बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। क्या राजेंद्र राठौड़ और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व किसी रसूखदार मंत्री के सियासी दबाव के आगे घुटने टेक चुका है? यह दोहरापन साबित करता है कि भाजपा के लिए नैतिकता केवल दूसरों को घेरने का ढोंग है, जिसे अपने घर में झांकते ही कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है।

आम कार्यकर्ता की पीठ में छुरा और चुनावी जुमलों की असलियत

भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं के भीतर आज भारी आक्रोश और निराशा का माहौल है। दशकों तक बूथ स्तर पर दिन-रात एक करने वाले, घर-परिवार छोड़कर रैलियों में भीड़ जुटाने वाले और पुलिस के डंडे खाने वाले आम कार्यकर्ता को अब समझ आ चुका है कि उसकी असली औकात क्या है। पार्टी में उसकी भूमिका केवल मंत्रियों की गाड़ियां रुकने पर नारे लगाने और उनके बेटे-बेटियों की जीत के बाद उन पर फूल बरसाने तक सीमित कर दी गई है।

जिस पार्टी ने चुनावी मंचों से ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा जोर-शोर से बेचा था, वह राजस्थान में आकर ‘अपने परिवार का साथ और अपने कुनबे का विकास’ में तब्दील हो चुकी है। जब पद और शक्ति देने का समय आता है, तो पार्टी की पूरी विचारधारा मंत्री के ड्राइंग रूम तक सिमट कर रह जाती है। यह उन लाखों युवाओं और समर्पित कार्यकर्ताओं के साथ खुला विश्वासघात है, जो इस भ्रम में भाजपा का झंडा उठाए घूम रहे थे कि यहां योग्यता और निष्ठा का सम्मान होता है, किसी खास कुल या खानदान का नहीं।

जनता की अदालत में बेनकाब होता पाखंड

भाजपा को यह मुगालता बिल्कुल छोड़ देना चाहिए कि जनता उसकी इस चालाकी और पाखंड को समझ नहीं रही है। जनता बहुत करीब से देख रही है कि कैसे देश भर में वंशवाद का हौव्वा खड़ा कर वोट मांगने वाली पार्टी खुद सत्ता में आते ही उसी बीमारी को गले लगा लेती है। झाबर सिंह खर्रा का प्रकरण कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं है, बल्कि यह भाजपा के अंदरूनी वैचारिक खोखलेपन और सत्तालोलुपता का जीवंत प्रतीक है।

यदि भाजपा नेतृत्व में रत्ती भर भी नैतिक साहस और अपने कहे शब्दों के प्रति ईमानदारी बची होती, तो पार्टी तुरंत प्रभाव से खर्रा परिवार को बांटे गए टिकट रद्द करती और निर्दलीय मैदान में उतरे मंत्री के परिजनों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई का चाबुक चलाती। लेकिन ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि भाजपा के लिए परिवारवाद का विरोध सिर्फ भाषणों में ताली बटोरने का एक सस्ता राजनीतिक हथियार है। राजस्थान की जागरूक जनता और पार्टी के छले गए कार्यकर्ता अब इस पाखंडी राजनीति को पहचान चुके हैं और वे आने वाले चुनावों में इस दोमुंही नीति का जवाब लोकतांत्रिक तरीके से देने के लिए तैयार बैठे हैं।

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