पुतिन दिल्ली पहुंचे, लेकिन असली बातचीत सिर्फ S-400 और तेल पर नहीं: मोदी के साथ बैठक में तय हो सकता है भारत-रूस रिश्तों का अगला आर्थिक मॉडल

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रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शुक्रवार तड़के नई दिल्ली पहुंच गए। उनका भारत दौरा ऐसे समय हो रहा है जब राजधानी 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए तैयार है और दुनिया की नजर भारत, रूस और चीन जैसे बड़े देशों के बीच बनने वाले नए समीकरणों पर टिकी है। पुतिन के विमान ने पालम एयरफोर्स स्टेशन पर लैंड किया, जहां केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने उनका स्वागत किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पुतिन की अहम द्विपक्षीय बैठक शुक्रवार को ही होने वाली है।

लेकिन इस मुलाकात को केवल एक और भारत-रूस शिखर बैठक के तौर पर देखना शायद इसके सबसे महत्वपूर्ण पहलू को नजरअंदाज करना होगा। इस बार बातचीत का असली सवाल यह हो सकता है कि भारत और रूस अपने पुराने रणनीतिक रिश्ते को नए आर्थिक और वित्तीय ढांचे में कैसे बदलेंगे।

यानी S-400, ब्रह्मोस और रूसी तेल महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके पीछे एक बड़ा सवाल है—जब वैश्विक भुगतान व्यवस्था और व्यापारिक रास्ते तेजी से बदल रहे हैं, तब भारत-रूस अपने बीच व्यापार को किस तरीके से आसान और टिकाऊ बनाएंगे?

पुतिन के दिल्ली पहुंचने से पहले ही सामने आया बड़ा संकेत

भारत इस साल BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वां BRICS शिखर सम्मेलन आयोजित होगा। भारत की अध्यक्षता का फोकस ‘Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability’ पर है। BRICS में अब 11 सदस्य देश हैं और समूह दुनिया की लगभग आधी आबादी तथा वैश्विक GDP के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।

इसी बीच भारत BRICS देशों के बीच केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी यानी CBDC को जोड़ने की दिशा में पहल कर रहा है। मकसद डॉलर को तुरंत हटाना नहीं, बल्कि अलग-अलग देशों के बीच भुगतान को तेज, सस्ता और अधिक लचीला बनाना है। इस प्रस्ताव के सामने तकनीकी और राजनीतिक चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन इसका महत्व भारत-रूस संबंधों के संदर्भ में खास है।

रूस पहले ही कह चुका है कि BRICS देशों के साथ उसके लगभग 90 फीसदी भुगतान राष्ट्रीय मुद्राओं के जरिए होते हैं। ऐसे में मोदी-पुतिन की बैठक में व्यापार भुगतान का यह मुद्दा रक्षा सौदों जितना ही रणनीतिक हो सकता है।

रूसी तेल ने रिश्ते मजबूत किए, लेकिन साथ में बढ़ाया एक सवाल

भारत और रूस के बीच पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा संबंध बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं। पश्चिमी प्रतिबंधों और वैश्विक भू-राजनीतिक बदलावों के बीच भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है। जुलाई में भारत के रूसी तेल आयात का स्तर करीब 2.47 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई थी।

इसका सीधा फायदा भारत को ऊर्जा सुरक्षा के स्तर पर मिला, लेकिन इसके साथ भारत-रूस व्यापार में असंतुलन भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीद रहा है, जबकि भारत से रूस को होने वाला निर्यात उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाया है।

यही वह बिंदु है जहां मोदी-पुतिन बैठक का आर्थिक महत्व बढ़ जाता है।

भारत को रूस से सिर्फ ज्यादा तेल नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा व्यापार मॉडल चाहिए जिसमें तेल के बदले भारत का निर्यात भी बढ़े।

इसमें फार्मास्यूटिकल्स, कृषि उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और सेवाओं की भूमिका बढ़ सकती है। अगर भुगतान व्यवस्था भी राष्ट्रीय मुद्राओं या नए डिजिटल माध्यमों से आसान होती है तो दोनों देशों के व्यापार को मौजूदा बाधाओं से बाहर निकालने में मदद मिल सकती है।

रक्षा एजेंडा रहेगा, लेकिन अगली पीढ़ी का सवाल बड़ा

रक्षा क्षेत्र निश्चित रूप से मोदी-पुतिन बातचीत के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में रहेगा। S-400 की शेष डिलीवरी, मौजूदा प्रणालियों का रखरखाव और ब्रह्मोस सहयोग जैसे मुद्दे चर्चा में आ सकते हैं।

इसके अलावा रूस की ओर से Su-57 पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान से जुड़े संभावित सहयोग की चर्चा भी सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक रक्षा के साथ-साथ तकनीक और सह-उत्पादन पर भी बातचीत संभव है।

लेकिन भारत के लिए अब सवाल केवल हथियार खरीदने का नहीं है।

भारत लगातार रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर जोर दे रहा है। ऐसे में आने वाले भारत-रूस रक्षा रिश्ते का मॉडल ‘Russia supplies, India buys’ से आगे बढ़कर ‘Russia and India develop, manufacture and maintain together’ की दिशा में जा सकता है।

यही बदलाव दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को अगले दशक तक प्रासंगिक बनाएगा।

यूक्रेन युद्ध भी कमरे में मौजूद रहेगा

मोदी-पुतिन वार्ता में यूक्रेन युद्ध का मुद्दा भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत लगातार बातचीत और कूटनीति के जरिए संघर्ष के समाधान की वकालत करता रहा है। वहीं रूस ने भारत की शांति संबंधी कोशिशों का स्वागत किया है।

इसके अलावा रूस में काम कर रहे भारतीय नागरिकों की वापसी का मुद्दा भी दोनों नेताओं की बातचीत में उठ सकता है। ऐसे मुद्दे दिखाते हैं कि भारत-रूस संबंध अब सिर्फ सरकारी और सैन्य साझेदारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका सीधा असर भारतीय नागरिकों, व्यापारियों और कंपनियों पर भी पड़ रहा है।

असली परीक्षा BRICS के मंच पर होगी

मोदी-पुतिन की शुक्रवार की बैठक दरअसल 12 और 13 सितंबर के BRICS शिखर सम्मेलन की बड़ी तस्वीर की भूमिका तैयार करेगी। इस सम्मेलन में ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश, तकनीक, सप्लाई चेन और वैश्विक शासन जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी है।

और यहीं भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर छिपा है।

भारत रूस के साथ अपनी विशेष रणनीतिक साझेदारी बनाए रखते हुए BRICS के भीतर ऐसा आर्थिक ढांचा विकसित करना चाहता है जिसमें भुगतान, ऊर्जा, व्यापार और तकनीक एक-दूसरे से जुड़े हों।

इसलिए पुतिन का दिल्ली पहुंचना सिर्फ एक राष्ट्रपति का दौरा नहीं है। यह उस सवाल की अगली कड़ी है कि भारत और रूस बदलती विश्व अर्थव्यवस्था में अपने रिश्ते को किस नए ढांचे में ढालेंगे।

अगर शुक्रवार की मोदी-पुतिन बैठक से व्यापार भुगतान, ऊर्जा और रक्षा तकनीक पर ठोस दिशा निकलती है, तो इसका असर सिर्फ द्विपक्षीय रिश्तों पर नहीं पड़ेगा। यह भारत की BRICS अध्यक्षता के उस बड़े लक्ष्य को भी आकार दे सकता है जिसमें ‘बहुध्रुवीय दुनिया’ केवल राजनीतिक नारा न रहकर व्यापार, भुगतान और तकनीक की वास्तविक व्यवस्था बने।

यही इस मुलाकात का वह पहलू है जिस पर आने वाले दिनों में सबसे ज्यादा नजर रखनी होगी।

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