EXCLUSIVE: आवासीय कॉलोनी में ‘कॉमर्शियल खेल’: संसार चंद्र रोड पर पांच मंजिला निर्माण ने उठाए कई सवाल

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राजधानी जयपुर में आवासीय इलाकों के व्यावसायिक इस्तेमाल और अवैध निर्माण को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। संसार चंद्र रोड पर बिचून बाग आवासीय कॉलोनी में करीब 500 वर्गगज के आवासीय भूखंड पर पांच मंजिला कॉमर्शियल कॉम्पलेक्स खड़ा किए जाने का मामला सामने आया है। दावा है कि इस निर्माण में बेसमेंट से लेकर पांचवीं मंजिल तक दुकानें और ऑफिस तैयार किए जा रहे हैं। निर्माण स्थल पर करीब 45 दुकानों का कॉम्पलेक्स विकसित किए जाने की बात सामने आई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आवासीय भूखंड पर इतने बड़े स्तर का व्यावसायिक निर्माण किस अनुमति के आधार पर किया जा रहा है और यदि निर्माण नियमों के विपरीत है तो संबंधित विभाग की ओर से समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

यह निर्माण संसार चंद्र रोड की मुख्य सड़क पर अम्बर टावर के सामने और मंगल होटल के पास बताया जा रहा है। व्यस्त सड़क और घनी आबादी वाले इलाके में बन रही इस बहुमंजिला इमारत को लेकर स्थानीय स्तर पर पार्किंग, सेटबैक, यातायात और आवासीय क्षेत्र के व्यावसायीकरण से जुड़े सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि नगर निगम के किशनपोल जोन के अधिकारियों को निर्माण के संबंध में शिकायतें दी गईं, लेकिन इसके बावजूद निर्माण गतिविधियां जारी रहीं।

मामला केवल एक इमारत के निर्माण तक सीमित नहीं है। यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो यह सवाल भी उठता है कि आवासीय भूखंड का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किस प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है। साथ ही, निर्माण की स्वीकृति, भू-उपयोग, पार्किंग, फायर सेफ्टी, सेटबैक और अन्य वैधानिक अनुमतियों की स्थिति क्या है—इन सभी बिंदुओं की जांच जरूरी हो जाती है।

500 वर्गगज के भूखंड पर पांच मंजिल का निर्माण

बिचून बाग आवासीय कॉलोनी में जिस भूखंड पर निर्माण किया जा रहा है, उसका क्षेत्रफल करीब 500 वर्गगज बताया जा रहा है। स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं के अनुसार यह मूल रूप से आवासीय भूखंड था। आरोप है कि इसी भूखंड को व्यावसायिक गतिविधियों के लिए विकसित करते हुए बेसमेंट से पांचवीं मंजिल तक दुकानों और ऑफिस के लिए जगह तैयार की गई।

निर्माण की मौजूदा स्थिति को लेकर सबसे गंभीर सवाल पार्किंग का है। आरोप है कि कॉम्पलेक्स में आने वाले ग्राहकों, दुकानदारों और कर्मचारियों के वाहनों के लिए पर्याप्त पार्किंग की व्यवस्था नहीं रखी गई है। यदि दर्जनों दुकानें और ऑफिस संचालित होते हैं तो रोजाना बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही होगी। ऐसे में वाहनों के सड़क और आसपास की कॉलोनी की गलियों में खड़े होने की आशंका जताई जा रही है।

स्थानीय निवासियों के लिए यही सबसे बड़ी चिंता बनती जा रही है। उनका कहना है कि आवासीय कॉलोनी में यदि बड़ी संख्या में दुकानें और व्यावसायिक गतिविधियां शुरू होती हैं तो सड़क पर यातायात का दबाव बढ़ेगा। सामान लाने-ले जाने वाले वाहन, ग्राहकों की कारें, दोपहिया वाहन और व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़ी आवाजाही कॉलोनी की सामान्य व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि संबंधित विभाग के स्वीकृत भवन मानचित्र, भू-उपयोग और मौके की आधिकारिक जांच के बाद ही हो सकती है।

‘ना पार्किंग, ना पर्याप्त सेटबैक’ का आरोप

किसी भी बहुमंजिला व्यावसायिक इमारत में पार्किंग और भवन मानकों का पालन महत्वपूर्ण होता है। इस मामले में शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि निर्माण में न तो आवश्यक पार्किंग की व्यवस्था की गई है और न ही निर्धारित सेटबैक छोड़ा गया है।

यदि किसी भूखंड पर लगभग 45 दुकानों का संचालन प्रस्तावित है तो पार्किंग की आवश्यकता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि स्वीकृत नक्शे में पार्किंग के लिए कितनी जगह निर्धारित की गई थी और मौके पर वास्तव में कितनी जगह उपलब्ध है।

यही वह बिंदु है जहां नगर निगम की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि निर्माण स्वीकृत नक्शे के अनुसार नहीं है, पार्किंग मानकों का पालन नहीं किया गया है या भवन मानकों का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित विभाग की जिम्मेदारी बनती है कि मौके का निरीक्षण कर स्थिति स्पष्ट करे।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि निर्माण को लेकर किशनपोल जोन के उपायुक्त और प्रवर्तन से जुड़े अधिकारियों तक शिकायत पहुंचाई गई। इसके बावजूद कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है। शिकायतकर्ताओं ने पूरे मामले में विभागीय स्तर पर मिलीभगत की आशंका भी जताई है। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इसे शिकायतकर्ताओं का आरोप ही माना जाना चाहिए।

बेसमेंट से पांचवीं मंजिल तक व्यावसायिक गतिविधियों की तैयारी

इस निर्माण की एक और खास बात यह बताई जा रही है कि कॉम्पलेक्स में केवल सड़क की ओर दुकानें ही नहीं, बल्कि बेसमेंट और ऊपरी मंजिलों पर भी व्यावसायिक उपयोग की तैयारी है।

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि कॉम्पलेक्स में चूड़ी बाजार विकसित किया जा रहा है। चूड़ी बाजार से जुड़े कुछ कारोबारियों द्वारा यहां दुकानें बुक कराने का दावा भी किया जा रहा है। यदि यह योजना लागू होती है तो आवासीय कॉलोनी के बीच एक बड़ा संगठित बाजार विकसित हो जाएगा।

इससे इलाके की प्रकृति में बड़ा बदलाव आ सकता है। जिस जगह का उपयोग आवासीय गतिविधियों के लिए किया जाना था, वहां यदि दर्जनों दुकानें, शोरूम और ऑफिस संचालित होने लगते हैं तो उस इलाके में प्रतिदिन आने-जाने वालों की संख्या कई गुना बढ़ सकती है।

यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर निर्माण को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि बाजार बनना चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि बाजार किस भू-उपयोग वाले क्षेत्र में और किन वैधानिक अनुमतियों के तहत बनाया जा रहा है।

चार बड़े शोरूम, करोड़ों के कारोबार का दावा

निर्माण से जुड़े लोगों के बीच सामने आ रही जानकारी के मुताबिक संसार चंद्र रोड की तरफ चार बड़े शोरूम बनाए गए हैं। दावा है कि इनमें से एक शोरूम की कीमत करीब पांच करोड़ रुपए तक बताई जा रही है।

इसी तरह अंदर की दुकानों की कीमत करीब डेढ़ करोड़ रुपए तक होने की बात कही जा रही है। दूसरी से पांचवीं मंजिल तक दुकानों और ऑफिस स्पेस की कीमत भी लाखों रुपए में बताए जाने का दावा है।

हालांकि इन कीमतों और बिक्री के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर नहीं हुई है। यदि इस तरह की बिक्री वास्तव में हो रही है तो एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या निर्माण और बिक्री की प्रक्रिया सभी वैधानिक अनुमतियों के साथ की जा रही है?

करीब 45 दुकानों वाला कॉम्पलेक्स होने की स्थिति में यह कोई छोटा निर्माण नहीं है। यहां होने वाला व्यावसायिक निवेश भी बड़ा हो सकता है। ऐसे में भवन की स्वीकृति, भू-उपयोग, निर्माण अनुमति और अन्य संबंधित दस्तावेजों की जांच केवल स्थानीय विवाद नहीं बल्कि नियामकीय जिम्मेदारी का विषय बन जाती है।

शिकायतों के बावजूद निर्माण जारी रहने का सवाल

इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल कार्रवाई को लेकर है।

यदि निर्माणाधीन इमारत वास्तव में नियमों के विपरीत है तो निर्माण शुरू होने के शुरुआती चरण में ही इसे रोका जा सकता था। बहुमंजिला निर्माण एक दिन में खड़ा नहीं होता। बेसमेंट से लेकर पांचवीं मंजिल तक निर्माण के लिए लंबा समय लगता है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन और नगर निगम की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि निर्माण को लेकर अधिकारियों को जानकारी दी गई थी। इसके बावजूद कार्रवाई नहीं होने से निर्माण लगातार आगे बढ़ता गया।

यही वह बिंदु है जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। यदि शिकायत वास्तव में दर्ज हुई थी तो उस पर क्या कार्रवाई की गई? क्या मौके का निरीक्षण हुआ? क्या भवन स्वीकृति की जांच की गई? क्या निर्माणकर्ता को नोटिस जारी किया गया? क्या निर्माण रोकने का आदेश दिया गया? यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई तो उसकी वजह क्या रही?

इन सवालों का जवाब नगर निगम के संबंधित जोन से ही मिल सकता है।

‘मिलीभगत’ के आरोप की भी जांच जरूरी

किसी भी अवैध निर्माण के मामले में अक्सर कार्रवाई न होने पर विभागीय मिलीभगत के आरोप लगते हैं। इस मामले में भी शिकायतकर्ताओं ने किशनपोल जोन के अधिकारियों और प्रवर्तन तंत्र की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।

हालांकि केवल आरोप के आधार पर किसी अधिकारी को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई है तो पूरी प्रक्रिया की जांच जरूर होनी चाहिए।

जांच में यह देखा जाना चाहिए कि निर्माण की अनुमति किस आधार पर दी गई थी, यदि दी गई थी तो किस प्रकार की अनुमति थी, भूखंड का मौजूदा भू-उपयोग क्या है, भवन का स्वीकृत नक्शा क्या है और मौके पर निर्माण उसी के अनुरूप है या नहीं।

इसके अलावा यह भी देखा जाना चाहिए कि निर्माण के दौरान नगर निगम के अधिकारियों की ओर से कितनी बार निरीक्षण किया गया। यदि कोई उल्लंघन पाया गया था तो उसके बाद क्या कार्रवाई की गई।

आवासीय कॉलोनी बनाम व्यावसायिक गतिविधि

जयपुर जैसे तेजी से विकसित होते शहर में आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्रों के बीच संतुलन बेहद महत्वपूर्ण है। शहर के पुराने इलाकों में पहले से ही यातायात, पार्किंग और अनियोजित व्यावसायिक गतिविधियों का दबाव है। ऐसे में आवासीय कॉलोनियों में बड़े कॉमर्शियल कॉम्पलेक्स विकसित होने से स्थानीय निवासियों की परेशानियां बढ़ सकती हैं।

आवासीय क्षेत्र में रहने वाले लोगों को शांत और व्यवस्थित वातावरण, सड़क तक पहुंच और मूलभूत सुविधाओं की आवश्यकता होती है। दूसरी तरफ व्यावसायिक परिसर में ग्राहकों की आवाजाही, डिलीवरी वाहन, पार्किंग और सामान की लोडिंग-अनलोडिंग जैसी गतिविधियां होती हैं।

यदि इन दोनों के बीच नियमन नहीं हो तो विवाद की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है।

बिचून बाग के मामले में भी यही सवाल सामने है कि जिस भूखंड पर निर्माण हो रहा है, उसका वैधानिक भू-उपयोग क्या है और प्रस्तावित व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किस स्तर की अनुमति आवश्यक है।

मास्टर प्लान के पालन पर भी सवाल

शहर में किसी भी निर्माण को केवल भवन की ऊंचाई या दुकानों की संख्या से नहीं देखा जा सकता। निर्माण का भू-उपयोग, स्वीकृत प्लान, सड़क की चौड़ाई, पार्किंग, सेटबैक, फायर सेफ्टी और अन्य भवन नियमों से अनुपालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि आवासीय क्षेत्र में इस प्रकार का व्यावसायिक निर्माण मास्टर प्लान की भावना के विपरीत है। उनका दावा है कि न्यायिक आदेशों में भी आवासीय क्षेत्रों में नियमों के विपरीत व्यावसायिक गतिविधियों पर रोक लगाने और अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की बात सामने आती रही है।

राजस्थान में चर्चित गुलाब कोठारी मामले के बाद मास्टर प्लान और भू-उपयोग के नियमों को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। इस संदर्भ में किसी भी निर्माण की वैधता का निर्धारण केवल दावे के आधार पर नहीं बल्कि संबंधित मास्टर प्लान, भवन उपविधियों, स्वीकृत मानचित्र और सक्षम प्राधिकरण के रिकॉर्ड के आधार पर होना चाहिए।

यही कारण है कि संसार चंद्र रोड के इस निर्माण की जांच भी दस्तावेजों और मौके की स्थिति को सामने रखकर की जानी चाहिए।

अगर निर्माण वैध है तो दस्तावेज सामने आएं

इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यदि निर्माणकर्ता के पास सभी जरूरी अनुमतियां हैं तो विवाद काफी हद तक स्वतः स्पष्ट हो सकता है।

नगर निगम के पास स्वीकृत भवन मानचित्र है या नहीं? भूखंड का भू-उपयोग क्या दर्ज है? क्या व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति है? बेसमेंट का स्वीकृत उपयोग क्या है? कितनी पार्किंग स्वीकृत है? कितने सेटबैक की आवश्यकता थी? कितनी मंजिलों की अनुमति दी गई? फायर सेफ्टी और अन्य आवश्यक अनुमतियां मौजूद हैं या नहीं?

इन सवालों के जवाब दस्तावेजों से मिल सकते हैं।

यदि निर्माण सभी नियमों के तहत स्वीकृत है तो संबंधित विभाग को स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करनी चाहिए। वहीं यदि निर्माण स्वीकृति के विपरीत है तो नियमों के मुताबिक कार्रवाई होना भी उतना ही जरूरी है।

कार्रवाई होगी या कॉम्पलेक्स पूरा होने का इंतजार?

मामले की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि निर्माण पूरा होने के बाद कार्रवाई करना प्रशासन के लिए और स्थानीय निवासियों के लिए अधिक जटिल स्थिति पैदा कर सकता है।

निर्माण के दौरान यदि कोई नियम उल्लंघन सामने आता है तो उसे रोकना अपेक्षाकृत आसान होता है। लेकिन जब दुकानें बिक जाएं, व्यापारी निवेश कर दें और बाजार शुरू हो जाए तो कार्रवाई की स्थिति में खरीदारों और व्यापारियों के हित भी जुड़े होते हैं।

इसलिए शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि निर्माण में कोई अनियमितता है तो समय रहते इसकी जांच होनी चाहिए।

यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि क्या कॉम्पलेक्स में दुकानों की बुकिंग या बिक्री वास्तव में हो रही है। यदि हो रही है तो संभावित खरीदारों को भवन की वैधानिक स्थिति की जानकारी दी जा रही है या नहीं, यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है।

सबसे बड़ा सवाल—जिम्मेदारी किसकी?

संसार चंद्र रोड के बिचून बाग में बन रहे इस कॉम्पलेक्स ने एक ऐसे सवाल को फिर सामने ला दिया है जो जयपुर में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है—क्या आवासीय इलाकों में व्यावसायिक निर्माण पर निगरानी पर्याप्त है?

करीब 500 वर्गगज के भूखंड पर पांच मंजिला निर्माण, दर्जनों दुकानों की तैयारी, पार्किंग और सेटबैक को लेकर शिकायतें और अधिकारियों को दी गई शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने के आरोप—ये सभी ऐसे बिंदु हैं जिनकी तथ्यात्मक जांच जरूरी है।

इस मामले में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जयपुर नगर निगम की है। निगम को निर्माण की फाइल, स्वीकृत मानचित्र, भू-उपयोग, मौके की स्थिति और शिकायतों का रिकॉर्ड सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

यदि निर्माण नियमों के अनुरूप है तो दस्तावेजों के आधार पर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि इसकी अनुमति किस आधार पर दी गई। यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कार्रवाई में देरी क्यों हुई, यह भी सामने आना चाहिए।

क्योंकि सवाल केवल एक कॉम्पलेक्स का नहीं है। सवाल यह है कि शहर की आवासीय कॉलोनियों में भविष्य में किस तरह का विकास होगा—नियोजित और नियमों के मुताबिक या फिर पहले निर्माण, बाद में वैधता तलाशने का रास्ता?

संसार चंद्र रोड पर बन रहा यह कॉम्पलेक्स इसी सवाल का एक नया उदाहरण बनकर सामने आया है। अब निगाहें नगर निगम किशनपोल जोन की कार्रवाई और उस कार्रवाई से पहले सामने आने वाले दस्तावेजों पर हैं।

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