भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर किसानों का विरोध क्यों? अभी समझौता हुआ भी नहीं, फिर आंदोलन की वजह क्या है? – जानिए

भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (India-US Trade Deal) को लेकर देशभर में किसान संगठनों की चिंता लगातार बढ़ रही है। दिलचस्प बात यह है कि यह समझौता अभी तक अंतिम रूप नहीं ले पाया है, इसके बावजूद किसान सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब समझौते पर अभी हस्ताक्षर भी नहीं हुए हैं, तो आखिर किसानों को किस बात का डर सता रहा है?

दरअसल, किसान संगठनों का कहना है कि यदि इस व्यापार समझौते के तहत अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में अधिक पहुंच (Market Access) मिलती है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत के छोटे और सीमांत किसानों को उठाना पड़ेगा। उनका मानना है कि अमेरिका में कृषि क्षेत्र को भारी सरकारी सब्सिडी मिलती है, जबकि भारत के किसान अपेक्षाकृत कम सहायता के साथ खेती करते हैं। ऐसे में सस्ते अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में आए तो घरेलू फसलों के दाम गिर सकते हैं और किसानों की आय पर गंभीर असर पड़ सकता है।

किसानों की सबसे बड़ी चिंता क्या है?

किसान मजदूर मोर्चा (KMM) समेत कई किसान संगठनों का कहना है कि यह समझौता केवल कृषि उत्पादों तक सीमित नहीं रहेगा। उनका दावा है कि भविष्य में डेयरी, पशुपालन, डिजिटल व्यापार, ई-कॉमर्स, सरकारी खरीद, बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) और सेवा क्षेत्र भी इस समझौते के दायरे में आ सकते हैं।

किसानों का तर्क है कि यदि विदेशी कंपनियों और उत्पादों को भारतीय बाजार में अधिक छूट मिलती है, तो स्थानीय उत्पादकों और छोटे व्यापारियों की प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता कमजोर पड़ जाएगी। यही वजह है कि वे चाहते हैं कि सरकार किसी भी तरह का समझौता करने से पहले कृषि क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित रखने की गारंटी दे।

अभी तक समझौता क्यों नहीं हुआ?

भारत और अमेरिका के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई अंतिम या अंतरिम व्यापार समझौता नहीं हो पाया है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, हालिया वार्ता में दोनों देशों के बीच कई अहम मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी। भारत ने अमेरिका से कुछ प्रमुख मांगें रखी हैं, जिनमें चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर टैरिफ सुविधा और भविष्य में अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाने का भरोसा शामिल है।

इसके साथ ही भारत ने कृषि क्षेत्र को लेकर अपना रुख स्पष्ट रखा है। सरकार का कहना है कि वह कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगी, जिससे भारतीय किसानों के हित प्रभावित हों।

सरकार का क्या कहना है?

केंद्र सरकार लगातार किसानों को भरोसा दिला रही है कि भारत के कृषि हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में कहा कि भारत वही व्यापार समझौता स्वीकार करेगा जो दोनों देशों के लिए संतुलित और लाभकारी होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार ऐसा कोई समझौता नहीं करेगी जिससे भारतीय किसानों, श्रमिकों, कारोबारियों या उपभोक्ताओं के हित प्रभावित हों।

वहीं, वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने भी कहा है कि समझौते का ढांचा लगभग तैयार है, लेकिन इसे तभी अंतिम रूप दिया जाएगा जब सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर भारत संतुष्ट होगा।

फिर किसान विरोध क्यों कर रहे हैं?

किसानों का कहना है कि किसी भी व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद उसमें बदलाव करना बेहद कठिन होता है। इसलिए वे चाहते हैं कि सरकार अभी से स्पष्ट रूप से लिखित आश्वासन दे कि कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों को किसी भी प्रकार की व्यापारिक रियायत का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा।

पिछले कुछ महीनों में पंजाब समेत कई राज्यों में किसान संगठनों ने मोटरसाइकिल रैलियां निकालीं और प्रस्तावित व्यापार समझौते की प्रतीकात्मक प्रतियां जलाकर अपना विरोध दर्ज कराया। उनका कहना है कि यह आंदोलन केवल मौजूदा समझौते के खिलाफ नहीं, बल्कि भारत की कृषि सुरक्षा और किसानों के भविष्य की रक्षा के लिए है।

हाल ही में हरियाणा सरकार और किसान संगठनों के बीच बातचीत के बाद स्थिति कुछ शांत हुई है। किसान नेता सरवन सिंह पंधेर के अनुसार, राज्य सरकार ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ बैठक कराने और हिरासत में लिए गए किसान नेताओं को रिहा कराने का आश्वासन दिया है। अब किसान संगठन अगली रणनीति इस बैठक और सरकार के रुख के आधार पर तय करेंगे।

आगे क्या?

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता अभी जारी है और कृषि सबसे संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है। सरकार का दावा है कि वह अपनी “रेड लाइन” पार नहीं करेगी, जबकि किसान संगठन चाहते हैं कि यह भरोसा केवल बयान तक सीमित न रहे, बल्कि अंतिम समझौते में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे।

यही वजह है कि समझौते पर हस्ताक्षर होने से पहले ही किसान आंदोलन कर रहे हैं। उनका मानना है कि अभी आवाज उठाने का समय है, क्योंकि एक बार समझौता लागू हो गया तो उसे बदलना बेहद मुश्किल हो सकता है। आने वाले दिनों में सरकार और किसान संगठनों के बीच होने वाली बातचीत इस विवाद की दिशा तय करेगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here