क्या राजस्थान को स्वास्थ्य मंत्री के रूप में डॉक्टर की जरूरत है? प्रसूताओं की मौत के बाद गजेंद्र सिंह खींवसर की जवाबदेही पर बड़ा सवाल

राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की मौत के मामलों ने एक बार फिर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। कोटा, जोधपुर, बीकानेर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा जैसे जिलों से सामने आए मामलों के बाद सरकार से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक पर सवाल उठ रहे हैं। 18 प्रसूताओं की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन घटनाओं की नैतिक जिम्मेदारी कौन लेगा?

इस पूरे विवाद के केंद्र में राजस्थान के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर हैं। विपक्ष लगातार उनके इस्तीफे की मांग कर रहा है और आरोप लगा रहा है कि स्वास्थ्य विभाग की विफलताओं की जिम्मेदारी मंत्री को लेनी चाहिए। वहीं, मंत्री के कुछ बयानों और प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनके व्यवहार को लेकर भी जनता में नाराजगी देखने को मिल रही है।

लेकिन इस पूरे मामले ने एक पुरानी बहस को फिर से जन्म दे दिया है—क्या स्वास्थ्य मंत्री का पद किसी डॉक्टर के पास होना चाहिए?

राजस्थान में आजादी के बाद से अब तक स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी कई राजनीतिक नेताओं ने संभाली है। राजस्थान सरकारों में समय-समय पर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग अलग-अलग मंत्रियों के पास रहा है। हालांकि, सभी पूर्व स्वास्थ्य मंत्रियों की आधिकारिक सूची और उनके पेशेगत विवरण एक साथ उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन यह तथ्य सामने आता है कि अधिकांश स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर नहीं, बल्कि राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाले नेता रहे हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्री बनने के लिए डॉक्टर होना अनिवार्य नहीं है। सरकारें अक्सर प्रशासनिक क्षमता, राजनीतिक अनुभव और नेतृत्व कौशल के आधार पर विभागों का बंटवारा करती हैं। लेकिन स्वास्थ्य विभाग अन्य मंत्रालयों से अलग है, क्योंकि यहां लिए गए फैसलों का सीधा असर लोगों की जिंदगी पर पड़ता है।

एक सड़क खराब होने से परेशानी हो सकती है, लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था की लापरवाही किसी व्यक्ति की जान ले सकती है। यही कारण है कि स्वास्थ्य मंत्री के पास चिकित्सा क्षेत्र की गहरी समझ, अस्पतालों की जमीनी स्थिति और मरीजों की समस्याओं को समझने की क्षमता होना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

यदि स्वास्थ्य मंत्री खुद डॉक्टर नहीं हैं, तो भी उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे डॉक्टरों, विशेषज्ञों और स्वास्थ्य अधिकारियों से सही सवाल पूछें, लापरवाही पर तुरंत कार्रवाई करें और मरीजों की पीड़ा को प्राथमिकता दें।

लेकिन राजस्थान में प्रसूताओं की मौत के मामले ने यही सवाल खड़ा किया है कि क्या राजनीतिक नेतृत्व स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर चुनौतियों को पर्याप्त संवेदनशीलता के साथ संभाल पा रहा है?

जब एक गर्भवती महिला अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ती है, तो वह केवल एक आंकड़ा नहीं होती। उसके पीछे एक परिवार की उम्मीदें, बच्चों का भविष्य और समाज का भरोसा जुड़ा होता है। ऐसी घटनाओं में केवल जांच बैठाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

गजेंद्र सिंह खींवसर से इस्तीफे की मांग इसी नैतिक जिम्मेदारी के आधार पर की जा रही है। विपक्ष का कहना है कि यदि स्वास्थ्य विभाग की निगरानी में इतनी बड़ी संख्या में मौतें हुई हैं, तो मंत्री को इसकी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।

सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वह स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के लिए क्या ठोस कदम उठा रही है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या व्यवस्था बनाई जाएगी।

आखिरकार सवाल केवल यह नहीं है कि स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर होना चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य मंत्रालय संभालने वाला व्यक्ति जनता की जिंदगी को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है या नहीं।

क्योंकि अस्पतालों में जाने वाली जनता को राजनीति नहीं, बेहतर इलाज चाहिए। परिवारों को बयान नहीं, भरोसा चाहिए। और राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था को सबसे ज्यादा जरूरत है—जवाबदेही और संवेदनशील नेतृत्व की।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here