राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की लगातार हो रही मौतों ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कोटा, जोधपुर, बीकानेर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा समेत कई जिलों में सामने आए मामलों के बाद सरकार से जवाबदेही की मांग तेज हो गई है। अब तक 18 प्रसूताओं की मौत के मामलों को लेकर जनता जानना चाहती है कि आखिर इन घटनाओं के पीछे कारण क्या हैं और जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई होगी।
लेकिन इन गंभीर सवालों के बीच राजस्थान के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर का एक बयान और उनका व्यवहार राजनीतिक विवाद का विषय बन गया है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब पत्रकारों ने प्रसूताओं की मौत, जांच प्रक्रिया, लापरवाही और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई को लेकर सवाल पूछे, तो मंत्री खींवसर ने जवाब देने के बजाय मुस्कुराते हुए कहा— “बाकी बातें ब्रेक के बाद करेंगे।”
यही एक वाक्य अब सरकार की संवेदनशीलता पर सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
क्या 18 महिलाओं की मौत जैसा गंभीर मुद्दा किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस के “ब्रेक” तक टाला जा सकता है? क्या उन परिवारों की पीड़ा, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके लिए भी यह सिर्फ एक राजनीतिक बयान या मीडिया बातचीत का हिस्सा है? यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि स्वास्थ्य विभाग सीधे इंसानी जिंदगी से जुड़ा हुआ है।
एक स्वास्थ्य मंत्री से जनता केवल आंकड़ों और योजनाओं की जानकारी नहीं चाहती, बल्कि वह संकट के समय संवेदनशील प्रतिक्रिया और जिम्मेदारी की उम्मीद करती है। जब किसी परिवार की गर्भवती महिला अस्पताल में दम तोड़ती है, तो वह केवल एक आंकड़ा नहीं होता, बल्कि एक परिवार का भविष्य प्रभावित होता है।
विपक्ष ने भी इस मामले को लेकर सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मंत्री का व्यवहार उन परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है, जिन्होंने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कथित लापरवाही में अपने परिजनों को खोया है। विपक्ष का कहना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर हंसी-मजाक या सवालों से बचने की कोशिश जनता के भरोसे को नुकसान पहुंचाती है।
यह पहली बार नहीं है जब मंत्री खींवसर के बयान पर सवाल उठे हैं। इससे पहले बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में प्रसूता मौत मामले को लेकर भी उनका एक बयान चर्चा में आया था। मीडिया के सवालों के जवाब में उन्होंने अस्पताल प्रशासन का बचाव करते हुए मरीज की स्थिति पर टिप्पणी की थी, जिस पर पत्रकारों ने सवाल उठाया था कि एक गर्भवती महिला “नाचते हुए” अस्पताल कैसे आ सकती है।
इन घटनाओं ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या सरकार स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और जवाबदेही तय करने को लेकर उतनी गंभीर है, जितनी जनता उम्मीद करती है?
स्वास्थ्य मंत्री का पद केवल विभाग चलाने तक सीमित नहीं होता। यह पद उस भरोसे का प्रतीक होता है जो आम नागरिक अस्पतालों और सरकारी व्यवस्था पर करता है। जब स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, तब मंत्री की हर प्रतिक्रिया जनता के बीच सरकार की छवि तय करती है।
18 प्रसूताओं की मौत के मामले में प्रदेश सरकार को केवल जांच रिपोर्ट जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों। साथ ही, जनता यह भी जानना चाहती है कि जिम्मेदारी तय होगी या फिर गंभीर सवालों का जवाब भी “ब्रेक के बाद” ही मिलेगा।
क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था में हर मिनट मायने रखता है। मरीजों की जिंदगी किसी कार्यक्रम का हिस्सा नहीं, बल्कि सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
